SEBI ने 'पोर्टफोलियो मैनेजर्स रूट फॉर इन्वेस्टिंग इन म्यूचुअल फंड यूनिट्स' (PRIM) लॉन्च किया है। अब निवेशक सिर्फ **₹25 लाख** के साथ प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजमेंट की सुविधा ले सकते हैं, जो पहले **₹50 लाख** थी।
निवेश का नया द्वार
SEBI के इस नए फ्रेमवर्क का मकसद निवेश प्रोफेशनल्स को सिर्फ डिस्ट्रीब्यूटर्स से हटाकर उन्हें जवाबदेह 'पोर्टफोलियो मैनेजर' बनाना है। इस नई व्यवस्था के तहत मैनेजर म्यूचुअल फंड्स, इंडेक्स फंड्स, ETF और स्पेशलाइज्ड फंड्स के जरिए कस्टमाइज्ड पोर्टफोलियो तैयार कर सकेंगे। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब मैनेजर क्लाइंट की कुल एसेट का 1.25 गुना तक एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव्स का उपयोग कर सकेंगे, जिससे मार्केट की उतार-चढ़ाव भरी स्थिति में पोर्टफोलियो को सुरक्षित (Hedge) करना आसान होगा।
फीस और सुरक्षा के कड़े नियम
निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए SEBI ने सख्त गाइडलाइंस तय की हैं:
- फीस की सीमा: फिक्स्ड मैनेजमेंट फीस को एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) के अधिकतम 1% तक सीमित कर दिया गया है।
- हितों का टकराव: अपनी ही एसेट मैनेजमेंट कंपनी की स्कीमों में निवेश की सीमा को 25% पर कैप कर दिया गया है।
- नेट वर्थ: इस रूट के लिए फर्म के पास कम से कम ₹2 करोड़ की नेट वर्थ होना अनिवार्य है।
एडवाइजरी से जवाबदेही की ओर
यह कदम भारत में वेल्थ मैनेजमेंट के तरीके को पूरी तरह बदल देगा। पहले कई एडवाइजर्स कमीशन मॉडल पर काम करते थे, लेकिन अब PRIM रूट में रजिस्टर्ड होने के बाद उन्हें एक 'एसेट एलोकेटर' के तौर पर कानूनी रूप से जवाबदेह होना होगा। इसका मतलब है कि पोर्टफोलियो के निर्माण, री-बैलेंसिंग और रिस्क मैनेजमेंट की पूरी जिम्मेदारी मैनेजर की होगी, न कि केवल स्कीम रिकमेंड करने की।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालांकि ₹25 लाख की एंट्री लिमिट से निवेशकों को फायदा होगा, लेकिन उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि वेल्थ मैनेजमेंट फर्में 1% की फीस कैप के साथ खुद को कैसे ढालती हैं। पोर्टफोलियो की सफलता मैनेजर की स्किल पर निर्भर करेगी, खासकर डेरिवेटिव्स के जरिए रिस्क मैनेज करने की उनकी क्षमता पर।
