साल 2026 में भारतीय प्राइमरी मार्केट में IPO की जबरदस्त हलचल है। इसे देखते हुए SEBI अब कॉर्पोरेट गवर्नेंस और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की भूमिका को और मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि निवेशकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
भारतीय शेयर बाजार में इस समय प्राइमरी मार्केट का उत्साह अपने चरम पर है। अक्टूबर 2026 तक 100 से ज्यादा कंपनियों ने IPO के जरिए बाजार से पूंजी जुटाई है। इस बढ़ती हलचल के बीच, मार्केट रेगुलेटर SEBI ने कंपनियों के मैनेजमेंट और उनके बोर्ड की कार्यप्रणाली पर नकेल कसने की तैयारी कर ली है।
डायरेक्टर्स को मिलेगी नई जिम्मेदारी
SEBI चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की भूमिका सिर्फ कागजी खानापूर्ति (Checkbox Compliance) तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अब उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और ESG जैसे आधुनिक रिस्क को मैनेज करने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इसका मुख्य मकसद माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करना है।
क्यों है यह बदलाव जरूरी?
बाजार में जो कंपनियां प्राइवेट से पब्लिक हो रही हैं, उनमें गवर्नेंस के अंतराल (gaps) को भरना SEBI की प्राथमिकता है। हालांकि, यह नई सख्ती विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए अनुपालन लागत (Compliance Cost) को बढ़ा सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल स्तर पर चल रही जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता और बाजार की वोलेटिलिटी नई लिस्ट होने वाली कंपनियों के प्रदर्शन पर असर डाल सकती है।
आने वाले समय में बाजार के जानकारों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि लिस्टिंग नियमों में और क्या बदलाव किए जा सकते हैं जो कंपनियों के बाजार में आने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाएंगे।
