SEBI बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) को नॉन-एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की अनुमति देने पर विचार कर रहा है। हालांकि, ब्रोकर्स ने अन-एक्जिट पोजिशन्स के ऑटोमैटिक ट्रांसफर को लेकर चिंता जताई है, जो उनके लिए बड़ा रिस्क बन सकता है।
क्या है SEBI का प्रस्ताव?
मार्केट रेगुलेटर SEBI अब फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के लिए कमोडिटी मार्केट के दरवाजे खोलने की तैयारी में है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य गोल्ड, सिल्वर और बेस मेटल्स जैसे नॉन-एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ग्लोबल पार्टिसिपेशन बढ़ाकर लिक्विडिटी में इजाफा करना है। 1 सितंबर, 2026 को कंसल्टेशन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद, अब रेगुलेटर जल्द ही अपना फाइनल फ्रेमवर्क जारी कर सकता है।
क्यों विरोध कर रहे हैं ब्रोकर्स?
प्लान के तहत, FPIs को डिलीवरी पीरियड शुरू होने से कम से कम 3 दिन पहले अपनी ट्रेड को स्क्वायर-ऑफ या रोलओवर करना होगा। विवाद की जड़ यह है कि यदि FPI ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो कॉन्ट्रैक्ट ऑटोमैटिक तरीके से ट्रेडिंग या क्लियरिंग मेंबर के खाते में ट्रांसफर हो जाएगा।
ब्रोकर्स का कहना है कि यह नियम उन्हें अनचाही और बड़ी पोजिशन्स अपने बुक्स पर रखने के लिए मजबूर कर सकता है। इससे न केवल उनके सामने रेगुलेटरी पोजीशन लिमिट्स की समस्या खड़ी होगी, बल्कि भारी वित्तीय रिस्क भी पैदा हो सकता है।
आगे की राह
इंडस्ट्री ग्रुप्स ने मांग की है कि इस तरह के ट्रांसफर को केवल 'आपातकालीन बैकस्टॉप' के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि रेगुलर सेटलमेंट प्रक्रिया के तौर पर। इसके अलावा, मार्जिन रिक्वायरमेंट्स और लाभ-हानि की स्पष्टता पर भी काम किया जाना जरूरी है। Multi Commodity Exchange (MCX) जैसे एक्सचेंज ऑपरेटर्स के लिए यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि FPI पार्टिसिपेशन से वॉल्यूम बढ़ सकता है, लेकिन रिस्क-मैनेजमेंट का सही ढांचा ही इस योजना की सफलता तय करेगा।
