बाजार नियामक SEBI एक बड़े बदलाव की योजना बना रहा है, जिसके तहत भारतीय Stock Exchanges को ट्रेडिशनल ट्रेडिंग के अलावा अन्य वैल्यू-ऐडेड सर्विस देने की अनुमति मिल सकती है।
कमाई के नए रास्ते तलाश रहा रेगुलेटर
भारतीय Stock Exchanges के लिए अब कमाई का दायरा बढ़ने वाला है। SEBI एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, जिससे एक्सचेंज अपने कोर बिजनेस यानी ट्रेडिंग के अलावा दूसरी सर्विस भी दे पाएंगे। इसका मुख्य मकसद एक्सचेंजों की ट्रांजेक्शन फीस पर निर्भरता को कम करना है ताकि वे बेहतर टेक्नोलॉजी और मार्केट सर्विलांस सिस्टम में निवेश कर सकें।
क्या है इसमें बड़ा जोखिम?
नया रेवेन्यू मॉडल सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसमें 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (Conflict of Interest) का खतरा भी है। जानकारों का कहना है कि अगर कोई एक्सचेंज खुद रेगुलेटर भी है और सर्विस प्रोवाइडर भी, तो वह अपने फायदे के लिए डेटा का गलत इस्तेमाल कर सकता है या ट्रेडिंग माहौल को प्रभावित कर सकता है। मार्केट की निष्पक्षता बनाए रखना एक्सचेंज की पहली जिम्मेदारी है, जिसके साथ समझौता करना मुश्किल हो सकता है।
कैसे लागू होगा यह नया बदलाव?
चूंकि मामला काफी संवेदनशील है, इसलिए SEBI इसे चरणबद्ध तरीके (Phased Manner) से लागू करने की तैयारी में है। शुरुआत में ऐसे सर्विस सेक्टर को चुना जाएगा जो मार्केट की अखंडता (Market Integrity) के लिए रिस्की न हों। रेगुलेटर का फोकस इस बात पर होगा कि रिटेल निवेशकों और बड़े इंस्टीट्यूशनल फर्मों के लिए कोई पक्षपात न हो।
फिलहाल यह मामला पॉलिसी एक्सप्लोरेशन स्टेज पर है। निवेशकों को अब SEBI के उन नियमों पर नजर रखनी चाहिए, जिनमें यह साफ होगा कि कौन-सी सर्विस की अनुमति मिलेगी और डेटा इस्तेमाल को लेकर क्या सुरक्षा मानक तय किए जाएंगे।
