SEBI की OTR पर नई चाल: लिक्विडिटी बढ़ाने की तैयारी
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने अपने ऑर्डर-टू-ट्रेड रेश्यो (OTR) फ्रेमवर्क में बड़े बदलावों की घोषणा की है, जो 6 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे। इन बदलावों के तहत, इक्विटी ऑप्शंस ट्रेडिंग और खास तौर पर मार्केट मेकर्स (market makers) के ऑर्डर्स को OTR पेनल्टी गणना से बाहर रखा जाएगा। नए नियमों के मुताबिक, ऑप्शंस के प्रीमियम के 40% के दायरे में या प्रीमियम वैल्यू के ₹20 (जो भी ज्यादा हो) के भीतर आने वाले ऑर्डर्स को पेनल्टी से छूट मिलेगी। यह कदम ट्रेडिंग की लागत को कम करने और ऑप्शंस सेगमेंट में लिक्विडिटी बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है। इसके साथ ही, मार्केट मेकर्स द्वारा लिक्विडिटी प्रदान करने के अपने ज़रूरी काम के हिस्से के तौर पर किए गए अल्गोरिदमिक ऑर्डर्स को भी OTR गणना से बाहर रखा जाएगा। यह कदम डेरिवेटिव्स मार्केट में ट्रेडिंग को और सुगम बनाने में मदद करेगा। हालांकि, कैश मार्केट और इक्विटी ऑप्शंस के अलावा अन्य डेरिवेटिव्स के लिए मौजूदा OTR फ्रेमवर्क, जिसमें लास्ट ट्रेडेड प्राइस (LTP) के लगभग 0.75% के दायरे में आने वाले ऑर्डर्स को छोड़कर बाकी नियम लागू रहेंगे, वह जारी रहेगा।
बजट का झटका और बाजार की नई हकीकत
यह राहत ऐसे समय में आई है जब हाल ही में यूनियन बजट 2026 ने डेरिवेटिव्स सेगमेंट पर ट्रांजेक्शन कॉस्ट (transaction cost) बढ़ा दी है। बजट में फ्यूचर्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) को 0.02% से बढ़ाकर 0.05% और ऑप्शंस प्रीमियम पर 0.1% से बढ़ाकर 0.15% कर दिया गया है। इन बढ़ोत्तरी से ट्रेडिंग की लागत बढ़ गई है और यह हालिया बाजार में आई गिरावट का एक कारण भी बनी है।
रिटेल निवेशकों की चिंता और बाजार पर असर
भारतीय डेरिवेटिव्स बाजार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी काफी ज़्यादा है, जो कुल ट्रेडिंग वॉल्यूम का लगभग 41% है। हालांकि, यह एक चिंताजनक आंकड़ा भी है कि पिछले चार सालों में 90% से अधिक रिटेल निवेशकों को डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में नुकसान उठाना पड़ा है। FY 2024-25 में यह शुद्ध नुकसान बढ़कर ₹1.05 लाख करोड़ तक पहुंच गया। दिसंबर 2024–मई 2025 के बीच इक्विटी इंडेक्स डेरिवेटिव्स में यूनिक रिटेल ट्रेडर्स की संख्या में 20% की गिरावट देखी गई, जो बढ़ती लागत और लगातार घाटे की ओर इशारा कर सकती है।
वैश्विक रुझान और भारत का बाजार
SEBI का यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेगुलेटर्स द्वारा अल्गोरिदमिक और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) की निगरानी के बढ़ते चलन के अनुरूप है। भारत में, अल्गोरिदमिक ट्रेडिंग करीब 50-55% ट्रेडिंग वॉल्यूम का हिस्सा है और 2033 तक इसके USD 1.27 बिलियन से अधिक के बाजार तक पहुंचने का अनुमान है। यह जहां बाजार की लिक्विडिटी और स्पीड बढ़ाता है, वहीं शॉर्ट-टर्म वोलेटिलिटी (volatility) के जोखिम भी पैदा करता है।
बाजार का मिजाज और वैल्यूएशन
फिलहाल, भारतीय इक्विटी मार्केट Nifty 50 इंडेक्स के साथ 22.4 के प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो पर ट्रेड कर रहा है। बजट 2026 ने ग्रोथ पर फोकस किया है, लेकिन STT में बढ़ोतरी ने अल्पकालिक अनिश्चितता को बढ़ाया है। विश्लेषकों का मानना है कि लॉन्ग-टर्म आउटलुक मजबूत है, लेकिन ऊंची लागत और विदेशी निवेश की कमी जैसे फैक्टर बाजार की सेंटिमेंट को प्रभावित कर रहे हैं। हाल ही में इंडिया-यूएस (India-US) ट्रेड डील की घोषणा ने निवेशकों की कुछ चिंताओं को कम किया है। बाजार की लिक्विडिटी और प्रतिभागियों की लागत के बीच संतुलन बनाने में SEBI के OTR एडजस्टमेंट की प्रभावशीलता पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
