SEBI ने पहली बार NCD जारी करने वाली कंपनियों के लिए लिस्टिंग नियमों को आसान बना दिया है। अब कंपनियों को अपने पुराने अनलिस्टेड डेट को पब्लिक एक्सचेंज पर लिस्ट करने की मजबूरी नहीं होगी, जिससे फंड जुटाना आसान हो जाएगा।
नियम बदलने की असली वजह
अब तक नियम यह था कि अगर कोई कंपनी नए NCDs लिस्ट करना चाहती थी, तो उसे अपने सभी पुराने, अनलिस्टेड डेट इंस्ट्रूमेंट्स को भी अनिवार्य रूप से लिस्ट करना पड़ता था। इस प्रक्रिया में कंपनियों पर भारी प्रशासनिक और फाइनेंशियल बोझ पड़ता था, जो कई प्राइवेट कंपनियों के लिए बाधा बना हुआ था।
कंपनियों के लिए क्या बदला?
रेगुलेटर ने अब 'ग्रैंडफादरिंग क्लॉज' (Grandfathering Clause) पेश किया है। इसका मतलब है कि कंपनियां अपने पुराने अनलिस्टेड डिबेंचर्स को मौजूदा स्थिति में ही रख सकती हैं। उन्हें अब पुरानी देनदारियों को लिस्ट करने या री-ऑर्गनाइज करने की जरूरत नहीं होगी। SEBI के इस कदम से कंपनियों के लिए पब्लिक बॉन्ड मार्केट में एंट्री करना अब काफी सस्ता और सरल हो जाएगा।
मार्केट पर इसका असर
भारत में ज्यादातर फंडिंग बैंक लोन के जरिए होती है, लेकिन सरकार एक मजबूत कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट बनाने पर जोर दे रही है। इस बदलाव से मार्केट में लिस्टेड कॉर्पोरेट पेपर की संख्या बढ़ने की उम्मीद है, जिससे निवेशकों को बेहतर पारदर्शिता और प्राइस डिस्कवरी की सुविधा मिलेगी।
क्या निवेशकों के लिए जोखिम है?
नहीं, रेगुलेटर ने निवेशकों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा है। भले ही पुरानी डेट के लिए ढील दी गई है, लेकिन कंपनी द्वारा भविष्य में जारी किए जाने वाले किसी भी नए NCD को लिस्टिंग और ट्रांसपेरेंसी के सभी कड़े नियमों का पालन करना होगा। यह कदम पारदर्शिता से समझौता किए बिना कॉर्पोरेट भागीदारी बढ़ाने के लिए उठाया गया है। अब देखना यह होगा कि आने वाली तिमाहियों में पब्लिक बॉन्ड इश्यूज में कितनी तेजी आती है।
