SEBI ने उन फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के लिए नियमों में ढील दी है, जो सिर्फ सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं। अब इन्हें इन्वेस्टर ग्रुप डिस्क्लोजर की जरूरत नहीं होगी, जिससे सरकारी बॉन्ड मार्केट में बड़े संस्थागत निवेशकों का आना आसान होगा।
भारतीय बाजार नियामक SEBI ने विदेशी निवेशकों के लिए प्रशासनिक बाधाओं को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को जारी एक सर्कुलर में, SEBI ने साफ किया कि जो FPIs पूरी तरह से सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) में निवेश करते हैं, उन्हें अब विस्तृत 'इन्वेस्टर ग्रुप डिस्क्लोजर' (Investor Group Disclosures) जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह छूट तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है।
RBI के साथ सामंजस्य
यह फैसला भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की जून 2026 की पॉलिसी का एक हिस्सा है। RBI ने पहले ही 'General Route' के तहत काम करने वाले FPIs के लिए कंसंट्रेशन लिमिट की शर्तों को हटा दिया था। चूंकि अब इन निवेशकों के लिए कैप मॉनिटरिंग की जरूरत नहीं रह गई थी, इसलिए SEBI ने अपने नियमों को RBI के दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपडेट किया है। पहले यह छूट केवल 'Fully Accessible Route' (FAR) तक सीमित थी, लेकिन अब इसे सभी सरकारी डेट (Debt) में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के लिए बढ़ा दिया गया है।
संस्थागत निवेशकों के लिए आसान राह
यह कदम सेंट्रल बैंक और सोवरेन वेल्थ फंड जैसे बड़े ग्लोबल खिलाड़ियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इससे भारतीय सॉवरेन डेट में निवेश के लिए कागजी कार्रवाई और ऑपरेशनल मुश्किलें कम होंगी। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि कंप्लायंस का बोझ कम होने से लॉन्ग-टर्म विदेशी पूंजी (Global Capital) का प्रवाह बढ़ सकता है।
हालांकि, निवेशकों को यह समझना होगा कि यह एक प्रशासनिक बदलाव है, न कि मार्केट के फंडामेंटल्स में बदलाव। बॉन्ड मार्केट का प्रदर्शन अब भी वैश्विक ब्याज दरों, महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों और करेंसी की स्थिरता जैसे बड़े मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स पर ही निर्भर करेगा। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह बदलाव आगामी डेट ऑक्शन्स में संस्थागत भागीदारी को बढ़ाता है या नहीं।
