स्टॉक ब्रोकरों ने SEBI से मांग की है कि नई अर्ली पे-इन (EPI) व्यवस्था के तहत पीक मार्जिन की गणना कैसे होगी, इस पर स्पष्ट गाइडलाइंस दी जाएं। ब्रोकरों को डर है कि मौजूदा ऑटोमेटेड सिस्टम के कारण उन्हें गलत तरीके से पेनाल्टी का सामना करना पड़ सकता है।
नियम में बदलाव और चुनौतियां
22 अक्टूबर 2026 को SEBI ने एक सर्कुलर जारी किया था, जिसका मकसद निवेशकों के लिए शेयर बेचने के बाद मिलने वाली राशि को तुरंत नए ट्रेड में इस्तेमाल करना आसान बनाना था। इसे 'अर्ली पे-इन' (EPI) कहा जाता है। इसमें निवेशक सेटलमेंट की समयसीमा खत्म होने से पहले ही अपने शेयर क्लीयरिंग कॉरपोरेशन को ट्रांसफर कर सकते हैं, जिससे फंड तुरंत उपलब्ध हो जाता है।
पीक मार्जिन का पेंच
समस्या तब आती है जब बात पीक मार्जिन की होती है। ब्रोकरों को यह सुनिश्चित करना होता है कि दिन भर उनके क्लाइंट्स के पास पर्याप्त फंड रहे। इसके लिए क्लीयरिंग कॉरपोरेशन दिन के दौरान रैंडम 'स्नैपशॉट' लेते हैं। ब्रोकरों को डर है कि अगर सिस्टम ने स्नैपशॉट उस वक्त लिया जब EPI वाला वेवर अभी प्रोसेस नहीं हुआ है, तो सिस्टम ट्रेड को मार्जिन डेफिसिट मान लेगा, जिससे ब्रोकरों पर अनावश्यक पेनाल्टी लग सकती है।
बाजार पर असर
यह नियम छोटे ब्रोकरेज हाउस के लिए काफी अहम है। पहले बड़ी कंपनियां भारी कैपिटल के जरिए इस गैप को भर लेती थीं, लेकिन अब EPI नियमों से छोटे ब्रोकरों को भी बराबरी का मौका मिलेगा। हालांकि, फरवरी 2027 तक लागू होने वाली इस व्यवस्था के लिए अभी टेक्निकल स्पष्टता की दरकार है। जब तक SEBI क्लीयरिंग कॉरपोरेशन को स्नैपशॉट लॉजिक अपडेट करने का निर्देश नहीं देता, तब तक ब्रोकर इन छूटों को देने में सावधानी बरत सकते हैं।
