SEBI ने Alternative Investment Funds (AIF) और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस (PMS) के लिए नियमों में बदलाव किया है। अब फंड मैनेजर्स बिना किसी थर्ड-पार्टी एजेंसी के सीधे निवेशकों को वेरीफाई कर सकेंगे, जिससे ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया तेज होगी।
प्रक्रिया अब होगी आसान
SEBI के नए सर्कुलर के अनुसार, अब AIF और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस के फंड मैनेजर्स को निवेशकों की पात्रता जांचने के लिए किसी बाहरी एजेंसी पर निर्भर नहीं रहना होगा। यह कदम खासतौर पर हाई-नेट-वर्थ निवेशकों को तेजी से जोड़ने के लिए उठाया गया है। यह व्यवस्था वैकल्पिक है, यानी फंड हाउस चाहें तो पुरानी तरह से थर्ड-पार्टी एजेंसी का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। इस वेरिफिकेशन की वैलिडिटी 3 साल होगी।
पात्रता के लिए जरूरी शर्तें (Eligibility Thresholds)
डायरेक्ट वेरिफिकेशन के लिए निवेशकों को कुछ वित्तीय पैमानों पर खरा उतरना होगा:
- व्यक्तिगत निवेशक, HUF, फैमिली ट्रस्ट और सोल प्रोपराइटरशिप: इनके लिए सिक्योरिटी मार्केट में कम से कम ₹5 करोड़ का एक्सपोजर होना जरूरी है।
- कॉर्पोरेट और अन्य ट्रस्ट: इनके लिए यह सीमा बढ़ाकर ₹20 करोड़ तय की गई है।
इसमें म्यूचुअल फंड, विदेशी बाजार और डीमैट सिक्योरिटीज को शामिल किया गया है। अगर एसेट्स का कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट उपलब्ध नहीं है, तो चार्टर्ड अकाउंटेंट का वैल्यूएशन सर्टिफिकेट अनिवार्य होगा।
अनुपालन की बढ़ी जिम्मेदारी
सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही फंड मैनेजर्स पर अनुपालन (Compliance) का बोझ भी बढ़ा है। अब सर्टिफिकेशन की पूरी जिम्मेदारी फंड हाउस की होगी। उन्हें 5 साल तक सभी डॉक्यूमेंट्स को सुरक्षित रखना होगा। साथ ही, SEBI ने साफ किया है कि विदेशी निवासियों (Overseas Residents) को बिना किसी अलग सर्टिफिकेट के 'Accredited Investor' माना जाएगा। अब देखना यह है कि फंड हाउस बिना किसी बाहरी मदद के कितनी सटीकता से इस जिम्मेदारी को निभाते हैं।
