SEBI ने बड़ा कदम उठाते हुए Foreign Portfolio Investors (FPIs) को नॉन-एग्री कमोडिटी डेरिवेटिव्स जैसे गोल्ड और एनर्जी में ट्रेडिंग की अनुमति दे दी है। बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए लाए गए इस नए नियम में FPIs के लिए **T-3** एग्जिट रूल अनिवार्य किया गया है।
बाजार में लिक्विडिटी का नया दौर
भारतीय कमोडिटी मार्केट में अब विदेशी निवेश की एंट्री होने जा रही है। SEBI ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) को अब सोना, चांदी, कच्चा तेल (Crude Oil) और बेस मेटल्स जैसे नॉन-एग्री कमोडिटी सेगमेंट में ट्रेड करने की हरी झंडी दे दी है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य भारतीय बाजारों में वॉल्यूम बढ़ाना और बेहतर प्राइस डिस्कवरी सुनिश्चित करना है।
क्या है नया T-3 नियम?
विदेशी निवेशकों के लिए SEBI ने एक सख्त फ्रेमवर्क तैयार किया है। FPIs किसी भी तरह की फिजिकल डिलीवरी नहीं ले सकते, यानी उन्हें केवल फाइनेंशियल ट्रेडिंग तक ही सीमित रहना होगा। इसे सुनिश्चित करने के लिए T-3 एग्जिट रूल लागू किया गया है। इसका मतलब है कि कांट्रैक्ट की एक्सपायरी से कम से कम 3 दिन पहले विदेशी निवेशकों को अपनी पोजीशन को स्क्वायर ऑफ करना अनिवार्य होगा।
अगर समय पर एग्जिट न किया तो क्या होगा?
यदि FPI निर्धारित T-3 विंडो के भीतर अपनी पोजीशन क्लोज नहीं करते हैं, तो नियमों के तहत कांट्रैक्ट ऑटोमैटिक रूप से ट्रेडिंग मेंबर को ट्रांसफर हो जाएगा। इसके बाद ट्रेडिंग मेंबर एक्सचेंज द्वारा घोषित सेटलमेंट प्राइस पर उस पोजीशन को स्क्वायर ऑफ कर देगा। इस प्रोसेस का लक्ष्य डिलीवरी साइकिल की अखंडता बनाए रखना है।
बाजार पर असर
यह कदम कमोडिटी मार्केट में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की शुरुआत है। इक्विटी मार्केट की तुलना में कमोडिटी में अब तक वॉल्यूम कम रहा है, लेकिन ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के आने से लिक्विडिटी बढ़ेगी। हालांकि, इसके साथ ही भारतीय बाजार अब ग्लोबल प्राइस ट्रेंड्स और सेंटीमेंट्स के प्रति पहले से अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विदेशी फंड्स भारतीय कमोडिटी कांट्रैक्ट्स में किस गति से अपनी हिस्सेदारी बढ़ाते हैं।
