SEBI ने नियमों में बदलाव करते हुए इक्विटी म्यूचुअल फंड्स को अपने बचे हुए कैश का **35%** हिस्सा गोल्ड, सिल्वर और इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट्स में निवेश करने की मंजूरी दे दी है।
क्या बदला है नियम?
मार्केट रेगुलेटर SEBI ने एक बड़ा बदलाव करते हुए इक्विटी म्यूचुअल फंड्स को अपनी निवेश रणनीति बदलने की छूट दे दी है। अब फंड मैनेजर्स अपने पोर्टफोलियो के उस हिस्से को, जो पूरी तरह स्टॉक में नहीं लगा है, गोल्ड ETF, सिल्वर ETF या फिर इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) में निवेश कर सकेंगे। यह सीमा फंड के कुल एसेट्स के 35% तक तय की गई है।
फंड मैनेजर्स को क्यों मिली यह छूट?
इस कदम के पीछे मुख्य उद्देश्य मार्केट की अस्थिरता को कम करना है। जब शेयर बाजार में भारी गिरावट आती है, तो गोल्ड और सिल्वर जैसी कमोडिटीज एक 'सेफ्टी नेट' यानी बचाव के तौर पर काम करती हैं। इससे फंड मैनेजर्स को मार्केट के उतार-चढ़ाव को संभालने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी।
रिटेल निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
आम निवेशकों के लिए यह बदलाव थोड़ा पेचीदा हो सकता है। यदि आपने अपने पोर्टफोलियो में पहले से ही गोल्ड या सिल्वर में निवेश कर रखा है, और आपका म्यूचुअल फंड मैनेजर भी इस नई छूट का इस्तेमाल करके इन्हीं एसेट्स में निवेश कर देता है, तो अनजाने में आपका इन कमोडिटीज में एक्सपोजर जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है।
एक्टिव बनाम पैसिव का गणित
इस फैसले से 'एक्टिव' और 'पैसिव' फंड्स के बीच का अंतर और गहरा गया है। इंडेक्स फंड्स या ETF अपने तय इंडेक्स के नियमों से बंधे होते हैं, इसलिए वे मनमर्जी से कमोडिटीज नहीं जोड़ सकते। जो निवेशक पूरी तरह 'प्योर इक्विटी' एक्सपोजर चाहते हैं, उनके लिए आने वाले समय में पैसिव फंड्स ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प साबित हो सकते हैं।
अब क्या करें निवेशक?
नियम बदलने के बाद अब आपको अपने म्यूचुअल फंड्स की मंथली 'फैक्ट शीट' और पोर्टफोलियो डिस्क्लोजर पर बारीकी से नजर रखनी होगी। यह चेक करना जरूरी है कि क्या आपका फंड मैनेजर इस नए अधिकार का उपयोग कर रहा है, ताकि आपका फाइनेंशियल प्लान बिगड़े नहीं।
