सेबी (SEBI) ने डिपोजिटरीज़ को एक बड़ी राहत दी है। अब ये संस्थान सितंबर से अपने सालाना इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड (IPF) की आय का 5% तक हिस्सा परिचालन खर्चों के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे। इसमें ऑडिट फीस और स्टाफ सैलरी जैसे खर्चे शामिल होंगे, लेकिन 95% राशि निवेशकों की सुरक्षा के लिए फंड में ही रखनी होगी।
अब डिपोजिटरीज़ के लिए खर्च चलाना होगा आसान
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने डिपोजिटरीज़ के इन्वेस्टर प्रोटेक्शन फंड (IPF) के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सितंबर महीने से, ये संस्थाएं अपने IPF कॉर्पस से होने वाली सालाना आय का 5% तक हिस्सा खास परिचालन और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगी।
क्या-क्या होंगे खर्चे?
इस नए नियम के तहत, IPF के ब्याज से ऑडिट फीस, टैक्स और चैरिटी कमिश्नरों द्वारा मांगे जाने वाले वैधानिक भुगतानों जैसे खर्चे उठाए जा सकेंगे। साथ ही, इन विशेष ट्रस्टों के प्रबंधन के लिए नियुक्त किए गए कर्मचारियों के वेतन का भुगतान भी इसी फंड से किया जा सकेगा।
95% राशि सुरक्षित
पहले के नियमों के अनुसार, IPF निवेश से होने वाली पूरी आय को फंड में ही फिर से निवेश करना पड़ता था। लेकिन नए नियमों के तहत, फंड की सुरक्षा पर ज़ोर देते हुए यह ज़रूरी है कि सालाना आय का कम से कम 95% हिस्सा फंड में ही जमा किया जाए। अगर किसी डिपोजिटरी के परिचालन खर्चे 5% की सीमा से कम रहते हैं, तो बची हुई राशि वापस फंड में जमा करनी होगी। वहीं, अगर खर्चे 5% की सीमा को पार करते हैं, तो डिपोजिटरी को अतिरिक्त खर्च अपनी जेब से उठाना होगा, न कि इन्वेस्टर फंड से।
निवेशकों को मिलेगी ज़्यादा स्पष्टता
यह बदलाव निवेशकों को पूंजी बाजार के प्रशासनिक ढांचे के वित्तपोषण के बारे में ज़्यादा स्पष्टता प्रदान करेगा। SEBI ने डिपोजिटरीज़ को अपनी आंतरिक नीतियों को अपडेट करने और इन वित्तीय समायोजनों के बारे में जानकारी अपनी वेबसाइटों पर स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने का निर्देश दिया है। यह कदम परिचालन दक्षता की ज़रूरत और निवेशकों के हितों की सुरक्षा के मुख्य लक्ष्य के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगा।
