Jane Street vs SEBI: SAT ने आदेश रखा सुरक्षित, मार्केट मैनिपुलेशन केस में फंसी बड़ी मछली

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Jane Street vs SEBI: SAT ने आदेश रखा सुरक्षित, मार्केट मैनिपुलेशन केस में फंसी बड़ी मछली

Securities Appellate Tribunal (SAT) ने Jane Street की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें फर्म ने SEBI से कुछ इंटरनल डॉक्यूमेंट्स की मांग की थी। फर्म पर **₹4,843.57 करोड़** के अवैध मुनाफे का आरोप है, जिसे उसने पहले ही एस्क्रो (Escrow) अकाउंट में जमा कर दिया है।

क्या है पूरा विवाद?

मामला 3 जुलाई, 2025 को जारी हुए SEBI के एक अंतरिम आदेश से शुरू हुआ। रेगुलेटर का आरोप है कि Jane Street ने Bank Nifty डेरिवेटिव्स में गड़बड़ी की है। SEBI के अनुसार, फर्म ने ₹4,370 करोड़ के फिजिकल स्टॉक्स खरीदे और साथ ही ₹32,114 करोड़ की भारी-भरकम 'बेयरिश' डेरिवेटिव पोजीशन ले रखी थी।

SEBI का क्या है तर्क?

रेगुलेटर का कहना है कि इस दोहरी रणनीति से बाजार में एक 'नेगेटिव फीडबैक लूप' तैयार किया गया, जिससे कैश सेगमेंट में दबाव बढ़ा और कीमतों में गिरावट आई। इसका फायदा उठाकर फर्म ने डेरिवेटिव पोजीशन से ₹4,843.57 करोड़ का अवैध मुनाफा कमाया। हालांकि, कंपनी का दावा है कि उनकी ट्रेडिंग गतिविधियां पूरी तरह से लीगल और स्टैंडर्ड थीं। फिलहाल, कंपनी ने इस पूरी राशि को रेगुलेटर के निर्देशानुसार एस्क्रो अकाउंट में जमा करा दिया है।

डॉक्यूमेंट्स को लेकर रस्साकशी

सुनवाई के दौरान Jane Street ने दलील दी कि अपना डिफेंस तैयार करने के लिए उन्हें SEBI और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बीच हुई कम्युनिकेशंस के नोट्स चाहिए। फर्म का दावा है कि एक इंटरनल सर्विलांस नोट से संकेत मिलता है कि उनके कामों का कीमतों पर प्रभाव नहीं पड़ा था। जवाब में SEBI ने कहा कि वे 10 GB से ज्यादा डेटा पहले ही साझा कर चुके हैं और किसी भी प्राइवेट या इंटरनल डॉक्यूमेंट को देने के लिए बाध्य नहीं हैं। रेगुलेटर ने इसे कानूनी प्रक्रिया में देरी करने की एक चाल बताया है।

यह केस एल्गो (Algo) और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग करने वाली कंपनियों के लिए काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में मार्केट इंटीग्रिटी को लेकर कड़े नियम तय हो सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.