भारत के फ्यूचर्स एंड ऑप्शन (F&O) बाजार में रिटेल ट्रेडर्स की हालत खस्ता है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में **88%** व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान उठाना पड़ा है, जिससे कुल **₹91,685 करोड़** की पूंजी बाजार में स्वाहा हो गई।
बाजार का कड़वा सच
SEBI की तमाम कोशिशों के बावजूद डेरिवेटिव्स मार्केट में आम निवेशकों का पैसा तेजी से डूब रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026 में 87.7% इंडिविजुअल ट्रेडर्स घाटे में रहे हैं। पिछले 5 सालों में रिटेल निवेशकों को कुल ₹3.85 लाख करोड़ का चूना लग चुका है।
क्यों जीत रहे हैं बड़े खिलाड़ी?
इस बाजार में असली मुनाफा विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स और प्रोप्राइटरी फर्म्स ले जा रहे हैं। ये संस्थाएं एडवांस एल्गोरिदम (Algo) और हाई-स्पीड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती हैं, जिसके सामने रिटेल ट्रेडर की कोई बिसात नहीं है। संस्थागत मुनाफे का 99% हिस्सा इन्हीं एल्गो-आधारित रणनीतियों से आता है।
'लॉटरी' वाली मानसिकता का जाल
ज्यादातर रिटेल ट्रेडर्स 'लॉटरी टिकट' की तरह ऑप्शन बाइंग (Option Buying) को देखते हैं। लगभग 97% ट्रेडर्स कॉल या पुट खरीदना पसंद करते हैं। समस्या यह है कि 'टाइम डिके' (Time Decay) के कारण अगर बाजार उम्मीद के मुताबिक नहीं चलता, तो ऑप्शंस की वैल्यू हर दिन गिरती है। छोटे-छोटे घाटे मिलकर कब बड़े नुकसान में बदल जाते हैं, निवेशक को पता भी नहीं चलता।
सख्त नियम, फिर भी नुकसान जारी
रेगुलेटर ने कैलेंडर-स्प्रेड मार्जिन बेनिफिट्स में बदलाव और कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाकर ट्रेडिंग को महंगा किया है। इन कदमों से एक्टिव ट्रेडर्स की संख्या 20% घटकर 78.6 लाख जरूर हुई है, लेकिन घाटा उठाने वालों का प्रतिशत जस का तस बना हुआ है। अब औसतन प्रति व्यक्ति नुकसान बढ़कर ₹1.17 लाख तक पहुंच गया है।
युवाओं के लिए खतरे की घंटी
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स का लॉस रेट 91.9% है। यह आने वाले समय में युवाओं की फाइनेंशियल हेल्थ के लिए एक बड़ा रिस्क है। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या F&O ट्रेडिंग के लिए इनकम प्रूफ, नेट वर्थ या अनिवार्य वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) को लिंक करना जरूरी हो गया है।
