कंपनी के वैल्यूएशन पर बड़ा सवाल
SEBI के इस कदम से राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) के शेयर के वैल्यूएशन (Valuation) पर गहरा असर पड़ने की आशंका है। नियामक ने कहा है कि कंपनी ने कई सालों तक जो कमाई दिखाई, उसमें से 99.8% शायद असली थी ही नहीं। इसका मतलब है कि जिन वित्तीय नतीजों के आधार पर निवेशक कंपनी में पैसा लगा रहे थे, वे अब भरोसे के लायक नहीं रहे। यह मामला सिर्फ छोटी-मोटी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि कंपनी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रहा है।
संस्थागत निवेशकों का भरोसा डगमगाया
अब इस मामले की जांच नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) भी करेगी। जब भी ऐसे बड़े वित्तीय घपले सामने आते हैं, खासकर जब कमाई को गलत तरीके से दिखाया गया हो, तो बड़े निवेशक घबरा जाते हैं और सुरक्षित निवेश की ओर भागते हैं। राजेश एक्सपोर्ट्स के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह फॉरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) से कैसे निपटती है और संस्थागत निवेशकों का भरोसा कैसे वापस जीतती है। सोने और ज्वैलरी सेक्टर की दूसरी कंपनियां जहां अपने स्टॉक और सप्लाई चेन को लेकर पारदर्शी होती हैं, वहीं राजेश एक्सपोर्ट्स का कथित तौर पर फर्जी पार्टियों से जुड़ाव उसके बिजनेस मॉडल को कमजोर बनाता है।
फॉरेंसिक ऑडिट की बड़ी मुश्किलें
कंपनी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह अपनी कमाई के सबसे बड़े स्त्रोतों को साबित नहीं कर पा रही है। आरोप है कि ₹11,487 करोड़ के लेन-देन में एक ही ब्रोकर काउंटर पार्टी था, जो कि एक बड़ी कंसंट्रेशन रिस्क (Concentration Risk) की ओर इशारा करता है। अगर फॉरेंसिक ऑडिटर यह पुष्टि कर देते हैं कि इन लेन-देन का कोई असल आर्थिक आधार नहीं था, तो कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और उसकी बुक वैल्यू (Book Value) किसी काम की नहीं रहेगी। साथ ही, जांच के दौरान रेगुलेटर्स को गलत जानकारी देने के कारण कंपनी के लिए भविष्य में फंड जुटाना भी बेहद मुश्किल हो जाएगा। राजेश मेहता, जो अब खुद ट्रेडिंग से बैन हैं, को इस मुश्किल रेगुलेटरी माहौल में कंपनी को संभालना होगा।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर फॉरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट और NFRA के फैसलों पर रहेगी। जब तक कंपनी यह साबित नहीं कर देती कि उसका मुख्य बिजनेस असली लेन-देन पर आधारित है, तब तक उसके वैल्यूएशन पर सिर्फ़ अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। एनालिस्ट्स अब कंपनी की ग्रोथ की बजाय उसके एसेट्स (Assets) की लिक्विडेशन वैल्यू (Liquidation Value) का आंकलन करेंगे, ताकि यह पता चल सके कि इस सब हंगामे के बाद कंपनी के पास असल में कितनी जायदाद या चलने लायक बिजनेस बचा है।
