करीब 27.6 लाख भारतीय घर खरीदार **₹12.44 लाख करोड़** की वैल्यू वाले प्रोजेक्ट्स के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं। रेगुलेटर्स ने सप्लाई चेन में रुकावट का हवाला देते हुए प्रोजेक्ट्स को टाइमलाइन एक्सटेंशन दी है, लेकिन खरीदारों पर ईएमआई (EMI) का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
घर खरीदने का सपना देख रहे लाखों लोगों के लिए राह आसान नहीं है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में करीब 27.6 लाख घर खरीदार ऐसे प्रोजेक्ट्स में फंसे हैं जो देरी का सामना कर रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स में कुल ₹12.44 लाख करोड़ का निवेश फंसा हुआ है। RERA के नियम खरीदारों की सुरक्षा के लिए बने थे, लेकिन अब कई डेवलपर्स बार-बार समय सीमा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, जिससे प्रोजेक्ट्स पूरे होने का नाम नहीं ले रहे।
'फोर्स मेज्योर' का नया बहाना
जुलाई 2026 के अंत में, मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स (MoHUA) ने राज्य के रेगुलेटर्स को प्रोजेक्ट्स के लिए 4 महीने का एक्सटेंशन देने की सलाह दी। सरकार ने इसका कारण वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव को बताया, जिसकी वजह से कंस्ट्रक्शन मटेरियल महंगा हो गया है। सरकार का मकसद था कि प्रोजेक्ट्स बंद न हों, लेकिन खरीदारों का तर्क है कि यह केवल उन बिल्डर्स को बचाने का जरिया है, जो पहले ही समय पर काम पूरा करने में नाकाम रहे हैं।
कागजों पर काम, असलियत में सन्नाटा
खरीदारों की सबसे बड़ी शिकायत सरकारी रिपोर्ट और साइट की हकीकत के बीच का अंतर है। कई डेवलपर्स प्रोजेक्ट को 95% से 100% पूरा दिखाकर एक्सटेंशन ले लेते हैं, जबकि वहां न तो फायर सेफ्टी सिस्टम होता है और न ही ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC)। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह समस्या और भी गहरी है, जहाँ डेटा के मुताबिक हर 100 नए रजिस्ट्रेशन के बदले 88 प्रोजेक्ट्स के लिए एक्सटेंशन की अर्जी दी जा रही है।
क्या कानूनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं बिल्डर्स?
याद रखें, RERA का एक्सटेंशन मतलब कानूनी छूट नहीं है। डेवलपर्स अभी भी ओरिजिनल पजेशन डेट के लिए खरीदारों को जुर्माना या मुआवजा देने के लिए बाध्य हैं। बहुत से खरीदार अब कानूनी रास्ते अपनाकर अपनी ईएमआई और नुकसान की भरपाई की मांग कर रहे हैं। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें एक्सटेंशन देने के नियमों को कितना सख्त बनाती हैं और क्या वे कंस्ट्रक्शन की हकीकत जांचने के लिए ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जैसे कड़े सबूत अनिवार्य करती हैं या नहीं।
