प्रस्तावित Securities Markets Code Bill, 2025 के क्लॉज 21 को लेकर विवाद छिड़ गया है। यह प्रावधान SEBI को खुद ही पेनल्टी (Penalty) बढ़ाने की ताकत देता है, जिसे लेकर विशेषज्ञों और सांसदों को न्यायिक निष्पक्षता पर चिंता है।
Securities Markets Code Bill, 2025 का मुख्य उद्देश्य भारत के प्रमुख बाजार कानूनों को एक फ्रेमवर्क के तहत लाना है, लेकिन इस समय सारा ध्यान इसके क्लॉज 21 पर टिका है। यह प्रावधान भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को यह अधिकार देता है कि वह अपने ही ऑफिसर्स द्वारा तय की गई पेनल्टी या निर्देशों की समीक्षा कर सके और उन्हें एकतरफा तरीके से बढ़ा सके। फिलहाल यह बिल Parliamentary Standing Committee on Finance के पास विचाराधीन है, जहाँ कानून विशेषज्ञों ने इसे 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) के तौर पर देखा है।
क्लॉज 21 पर विवाद क्यों?
वर्तमान व्यवस्था में SEBI ही बाजार का मुख्य रेगुलेटर है। आलोचकों का तर्क है कि क्लॉज 21 के आने से रेगुलेटर खुद ही अभियोजक (Prosecutor) और जज दोनों की भूमिका में आ जाएगा। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह शक्ति एकतरफा है क्योंकि इसमें पेनल्टी बढ़ाने का प्रावधान तो है, लेकिन अगर कोई आदेश बहुत कठोर हो, तो उसे कम करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इससे लिस्टेड कंपनियों और निवेशकों के लिए अनिश्चितता का माहौल बन सकता है, क्योंकि पुराने मामलों को रेगुलेटर कभी भी दोबारा खोलकर जुर्माना बढ़ा सकता है।
स्वतंत्र निगरानी की मांग
विशेषज्ञों का सुझाव है कि आंतरिक शक्तियों के बजाय, मामले को Securities Appellate Tribunal (SAT) के पास ले जाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर पेनल्टी कम लगती है, तो रेगुलेटर को किसी स्वतंत्र बॉडी का सहारा लेना चाहिए, न कि खुद ही फैसला बदलना चाहिए। इससे टैक्स और कस्टम्स की तरह एक निष्पक्ष माहौल तैयार होगा और बाजार का भरोसा बना रहेगा।
बिल की वर्तमान स्थिति
दिसंबर 2025 में लोकसभा में पेश किया गया यह बिल SEBI Act 1992, Securities Contracts (Regulation) Act 1956, और Depositories Act 1996 को मिलाकर बनाया जा रहा है। अक्टूबर 2026 तक यह बिल अभी कानून नहीं बना है। अब सबकी नजरें Parliamentary Standing Committee की रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या सरकार क्लॉज 21 में बदलाव करती है या इसे ऐसे ही आगे बढ़ाती है।
