Ola Electric ने **₹1,000 करोड़** का राइट्स इश्यू लाने का ऐलान किया है, लेकिन कंपनी अब नियामक जांच के घेरे में है। SEBI द्वारा भ्रामक खुलासों की जांच और ऑडिटर्स द्वारा फाइनेंशियल कंट्रोल में खामियां निकालने से निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
SEBI की रडार पर कंपनी
भाविश अग्रवाल के नेतृत्व वाली Ola Electric Mobility फंड जुटाने की तैयारी में है, लेकिन कंपनी पर नियामक संकट गहरा गया है। SEBI ने कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नियामक की मुख्य चिंता कंपनी द्वारा सेल्स डेटा, स्टोर विस्तार और रोडस्टर मोटरसाइकिल प्रोटोटाइप की डिलीवरी को लेकर किए गए दावों की सटीकता पर है। आरोप है कि कंपनी ने कन्फर्म्ड ऑर्डर्स को 'कंप्लीट सेल्स' के रूप में दिखाया, जिससे आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए।
ऑडिटर्स ने उठाए गंभीर सवाल
राइट्स इश्यू के दस्तावेजों से कंपनी के इंटरनल गवर्नेंस की पोल खुल गई है। ऑडिटर्स ने फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए कंपनी के इंटरनल फाइनेंशियल कंट्रोल्स पर 'क्वालिफाइड ओपिनियन' दी है। इसका सीधा मतलब है कि ऑडिटर्स को कंपनी की इंटरनल रिपोर्टिंग और चेकिंग सिस्टम पर्याप्त नहीं लगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि पैरेंट कंपनी के साथ-साथ Ola Cell Technologies और Ola Electric Technologies जैसी सब्सिडियरीज में भी अनिवार्य इंटरनल ऑडिट सिस्टम नदारद थे। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस के लिए जरूरी 'इन्वेंट्री वेरिफिकेशन' प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं।
निवेशकों के सामने असमंजस
कंपनी ने पहले IPO और अन्य फंडिंग राउंड्स के जरिए काफी पैसा जुटाया था। ऐसे में नए फंड की मांग पर सवाल उठ रहे हैं कि कंपनी की कैपिटल प्लानिंग का क्या हाल है। जून 2026 में SEBI के पास फाइल की गई सेटलमेंट एप्लीकेशन और ऑडिट की इन खामियों ने शेयरधारकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कंपनी अपनी सेल्स के आंकड़ों को साबित कर पाएगी और अपने फाइनेंशियल सिस्टम की कमियों को कैसे दुरुस्त करेगी।
