Nifty Midcap 150 इंडेक्स में भारी फेरबदल देखने को मिला है। फाइनेंशियल ईयर **2022** से अब तक कुल **275** कंपनियों ने इस इंडेक्स में एंट्री की है, लेकिन इनमें से सिर्फ **46** कंपनियां ही ऐसी हैं जो लगातार इस इंडेक्स का हिस्सा बनी हुई हैं। इस हाई टर्नओवर के कारण निवेशकों के लिए इंडेक्स का पुराना डेटा और वैल्यूएशन एनालिसिस कम भरोसेमंद हो गया है।
Nifty Midcap 150 इंडेक्स का स्ट्रक्चर लॉन्ग-टर्म ट्रेंड को ट्रैक करने वाले निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इंडेक्स के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि हर छह महीने में होने वाली रीबैलेंसिंग के चलते यह इंडेक्स काफी फ्लूइड (तरल) रहता है। जब कंपनियों का मार्केट कैप बढ़ता है, तो वे निफ्टी 50 या निफ्टी नेक्स्ट 50 जैसी बड़ी इंडेक्स में प्रमोट हो जाती हैं, जबकि कमजोर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां इंडेक्स से बाहर हो जाती हैं।
वैल्यूएशन एनालिसिस में क्यों आ रही है दिक्कत?
इन्वेस्टर्स अक्सर इंडेक्स के मौजूदा P/E रेशियो की तुलना उसके 5 साल के औसत से करते हैं। लेकिन इंडेक्स की बदलती बनावट के कारण, आप असल में दो अलग-अलग तरह की कंपनियों के बास्केट की तुलना कर रहे होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत हो सकता है कि बाजार महंगा है या सस्ता।
सेक्टर का दबदबा और रिस्क
इंडेक्स में 150 शेयर होने के बावजूद, अक्सर देखा गया है कि सिर्फ 3 सेक्टर ही इंडेक्स की कुल मूवमेंट का बड़ा हिस्सा (कभी-कभी 100% से ज्यादा) तय करते हैं। जब किसी खास थीम या सेक्टर में तेजी आती है, तो वह पूरी इंडेक्स की चाल को हाईजैक कर लेता है, जिससे बाकी कंपनियों की असली हेल्थ का पता नहीं चल पाता। यह इंडेक्स एक व्यापक आर्थिक इंडिकेटर की जगह शॉर्ट-टर्म मोमेंटम का पैमाना बनकर रह गया है।
निवेशकों के लिए सलाह
निवेशकों को इंडेक्स के हेडलाइन नंबर्स से आगे देखना होगा। चूंकि इंडेक्स का परफॉर्मेंस अक्सर कुछ चुनिंदा शेयरों पर निर्भर करता है, इसलिए ऐतिहासिक डेटा पर आंख मूंदकर भरोसा करना रिस्की हो सकता है। बेहतर होगा कि आप इंडेक्स के औसत पर दांव लगाने के बजाय उन कंपनियों के फंडामेंटल्स, अर्निंग ग्रोथ और कर्ज (Debt) प्रोफाइल पर फोकस करें जिनमें आपने निवेश किया है। इंडेक्स का कंपोजिशन एक 'मूविंग टारगेट' है, जिसे लगातार मॉनिटर करना जरूरी है।
