भारतीय शेयर बाजार के लिए दौर बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। Nifty 50 में लगातार 9वें हफ्ते गिरावट दर्ज की गई है, जो साल 2001 के बाद सबसे लंबा सिलसिला है। इंडेक्स **22,231.80** पर बंद हुआ है और अब सबकी नजरें **22,000** के क्रिटिकल सपोर्ट लेवल पर टिकी हैं।
भारतीय शेयर बाजार फिलहाल एक दुर्लभ मंदी के दौर से गुजर रहा है। 9 अक्टूबर, 2026 तक Nifty 50 में लगातार 9 हफ्तों की गिरावट दर्ज की गई है, जो अप्रैल 2001 के बाद का सबसे लंबा गिरावट का दौर है। यह लगातार गिरता हुआ ग्राफ निवेशकों के बीच गहरी चिंता पैदा कर रहा है।
8 अक्टूबर को इंडेक्स 22,231.80 के स्तर पर बंद हुआ, जिसमें एक ही दिन में 1.64% की गिरावट देखी गई। पिछले नौ हफ्तों में यह इंडेक्स कुल मिलाकर करीब 9.5% टूट चुका है और अपने हालिया हाई से 2,300 से ज्यादा अंक गंवा चुका है।
बाजार पर दबाव के मुख्य कारण
बाजार पर सबसे भारी दबाव विदेशी निवेशकों (FIIs) की तरफ से आ रहा है। साल 2026 में विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली ₹3 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। मजबूत डॉलर और अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड के कारण ग्लोबल कैपिटल का रुझान इमर्जिंग मार्केट के बजाय अमेरिका की ओर शिफ्ट हो रहा है।
वहीं, घरेलू मोर्चे पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भी सख्ती दिखाई है। रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% कर दिया गया है। करीब चार साल में पहली बार हुई यह बढ़ोतरी महंगाई पर लगाम लगाने के लिए है, लेकिन इसने कंपनियों के लिए कर्ज की लागत को बढ़ा दिया है, जिससे मार्केट सेंटीमेंट पर असर पड़ रहा है।
आगे की चुनौतियां
महंगाई और ब्याज दरों के साथ-साथ ग्लोबल कमोडिटी की कीमतें भी सिरदर्द बनी हुई हैं। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं, जिससे कंपनियों के इनपुट कॉस्ट बढ़ने और उनके मार्जिन पर असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
तकनीकी तौर पर देखें तो अब बाजार के लिए 22,000 का लेवल एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सपोर्ट है। अगर इंडेक्स इस स्तर को नहीं बचा पाया, तो बाजार में और उथल-पुथल देखने को मिल सकती है। फिलहाल निवेशक कंपनियों के तिमाही नतीजों, FII की गतिविधियों और कच्चे तेल की कीमतों पर अपनी बारीक नजर बनाए हुए हैं।
