भारत की सबसे बड़ी लिस्टेड कंपनियों के बोर्ड में उम्र बढ़कर **64** साल तक पहुंच गई है और जेंडर डाइवर्सिटी में भी ठहराव आया है। FY26 Excellence Enablers सर्वे के मुताबिक, **17** कंपनियां स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) के नियमों का पालन नहीं कर रही हैं, जो सीधे तौर पर ऑपरेशनल रिस्क की ओर इशारा करता है।
भारत की दिग्गज कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस एक बार फिर जांच के दायरे में है। Excellence Enablers के FY26 सर्वे के अनुसार, Nifty 100 कंपनियों के बोर्ड मेंबर्स की औसत उम्र पिछले साल के 63.5 से बढ़कर 64 साल हो गई है। बोर्ड में युवाओं की कमी का मतलब है कि नई तकनीक और बदलती वैश्विक स्थितियों के दौर में ताजा नेतृत्व और दूरदर्शिता की कमी हो सकती है।
जेंडर डाइवर्सिटी और अनुपालन में चूक
बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी 21% से घटकर 20% पर आ गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 17 Nifty 100 कंपनियों, जिनमें ज्यादातर सरकारी कंपनियां शामिल हैं, ने स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति के अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया है। शेयरधारकों के लिए यह एक गंभीर संकेत है, क्योंकि स्वतंत्र निदेशक ही माइनॉरिटी निवेशकों के हितों की रक्षा करते हैं।
विसलब्लोअर शिकायतें और पारदर्शिता का अभाव
FY26 में Nifty 100 कंपनियों में कुल 1,129 विसलब्लोअर शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 13.37% शिकायतें साल के अंत तक भी अनसुलझी रहीं। चिंताजनक बात यह है कि टॉप 100 में से 53 कंपनियों ने अपनी सालाना रिपोर्ट में इन शिकायतों का पूरा विवरण नहीं दिया है। पारदर्शिता की इस कमी से निवेशकों के लिए धोखाधड़ी या कदाचार जैसे गंभीर आंतरिक मुद्दों का आकलन करना मुश्किल हो जाता है।
निवेशकों के लिए गवर्नेंस क्यों जरूरी है?
गवर्नेंस क्वालिटी सीधे तौर पर ESG स्कोर को प्रभावित करती है। जिन कंपनियों के बोर्ड पारदर्शी और विविध होते हैं, वे रिस्क मैनेजमेंट में अधिक सक्षम मानी जाती हैं। इसके विपरीत, खराब अनुपालन और कमजोर उत्तराधिकार योजना वाली कंपनियों को भविष्य में वैल्यूएशन डिस्काउंट का सामना करना पड़ सकता है। निवेशकों की नजर अब इन कंपनियों के बोर्ड कंपोजिशन और आंतरिक शिकायतों के खुलासे पर बनी हुई है।
