सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) ने आय कर रिटर्न (Income Tax Return) की अनिवार्य जांच के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। जो टैक्सपेयर्स पिछली सर्वे, तलाशी, या बड़े टैक्स विवादों में शामिल हैं, वे अब खास निगरानी में रहेंगे। यह कदम हाई-रिस्क मामलों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उठाया गया है।
क्या है नया नियम?
सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) ने आय कर रिटर्न (Income Tax Return) की अनिवार्य जांच (Compulsory Scrutiny) के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं। इससे यह साफ हो गया है कि कौन से टैक्स फाइलिंग्स की अब गहराई से जांच की जाएगी। टैक्स डिपार्टमेंट अब हाई-रिस्क वाले मामलों को अलग करके उन पर ज़्यादा फोकस करेगा, जबकि सामान्य रिटर्न सामान्य फेसलेस असेसमेंट सिस्टम (Faceless Assessment System) के तहत प्रोसेस होते रहेंगे।
किन मामलों की होगी जांच?
नई गाइडलाइंस के अनुसार, छह मुख्य कैटेगरीज़ हैं जिनमें टैक्स रिटर्न की ऑटोमैटिक या अनिवार्य जांच की जाएगी:
- सर्वे ऑपरेशन (Survey Operations): 1 अप्रैल 2024 के बाद शुरू हुए सेक्शन 133A के तहत सर्वे से जुड़े रिटर्न।
- तलाशी और जब्ती (Search & Seizure): 1 अप्रैल 2024 के बाद सेक्शन 132 के तहत हुई तलाशी या सेक्शन 132A के तहत जब्ती की कार्रवाई से जुड़े रिटर्न।
- पुनर्मूल्यांकन (Reassessment): सेक्शन 148 के तहत नोटिस जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन के मामले। इनकी जांच पुनर्मूल्यांकन के कारण पर निर्भर करेगी।
- ट्रस्ट और चैरिटेबल संस्थाएं: जिन संस्थाओं की टैक्स छूट (Tax Exemption) रद्द या वापस ली गई है।
- पिछले सालों के बड़े टैक्स जोड़ (Tax Additions):
- मेट्रो शहरों (Mumbai, Delhi, Bengaluru, Hyderabad, Pune, Kolkata, Chennai) में पिछले सालों में ₹50 लाख से ज़्यादा का टैक्स एडिशन होने पर।
- अन्य शहरों में ₹20 लाख से ज़्यादा का टैक्स एडिशन होने पर, जिसे अंतिम रूप दिया गया हो या अपीलेट बॉडी (Appellate Body) द्वारा बरकरार रखा गया हो।
डेटा एनालिटिक्स का रोल
इन विशेष कैटेगरीज़ के अलावा, टैक्स डिपार्टमेंट अब इंटेलिजेंस-आधारित इनपुट (Intelligence-driven Inputs) पर भी निर्भर करेगा। अगर लॉ एनफोर्समेंट (Law Enforcement), इंटेलिजेंस यूनिट्स (Intelligence Units) या अन्य रेगुलेटरी बॉडीज़ (Regulatory Bodies) द्वारा टैक्स चोरी (Tax Evasion) के संभावित मामलों में रिटर्न को फ्लैग किया जाता है, तो उसकी भी अनिवार्य जांच होगी। CBDT ने साफ किया है कि एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस (SFT) से मिले डेटा के आधार पर ही किसी रिटर्न की फुल रिव्यू नहीं होगी, जब तक वह इन हाई-रिस्क कैटेगरीज़ में न आए।
टैक्सपेयर्स के लिए मतलब
यह बदलाव बताता है कि टैक्स डिपार्टमेंट अब अपना रिसोर्स हाई-रिस्क और जटिल मामलों पर केंद्रित कर रहा है। आम टैक्सपेयर्स के लिए, यह एक रिमाइंडर है कि अपने फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स को सटीक और अच्छी तरह से डॉक्यूमेंटेड रखें। अगर आप ऊपर बताई गई किसी भी कैटेगरी में आते हैं, तो टैक्स अथॉरिटीज के साथ ज़्यादा विस्तृत बातचीत के लिए तैयार रहें, भले ही फेसलेस असेसमेंट मॉडल में फिजिकल मीटिंग्स कम होती हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों और कॉर्पोरेट टैक्सपेयर्स के लिए, टैक्स लिटिगेशन (Tax Litigation) और एडमिनिस्ट्रेटिव प्रेशर (Administrative Pressure) बढ़ने की संभावना है। हालांकि, ज़्यादातर सामान्य रिटर्न फाइल करने वालों को सामान्य प्रोसेसिंग टाइम मिलेगा। जिन लोगों के बिज़नेस स्ट्रक्चर जटिल हैं या जिनके पिछले टैक्स विवाद रहे हैं, उन्हें अपने डॉक्यूमेंटेशन को मज़बूत रखना चाहिए। टैक्सपेयर्स के लिए सबसे ज़रूरी है कि वे सेक्शन 143(2) के तहत आने वाले किसी भी नोटिस पर नज़र रखें और इनकम टैक्स पोर्टल (Income Tax Portal) पर आने वाले कम्युनिकेशन से अपडेट रहें।
