साल 2026 में आए SME IPOs में निवेशकों की मेहनत की कमाई खतरे में है। लगभग **46%** कंपनियां अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रही हैं, जिससे निवेशकों को महज **1%** का औसत रिटर्न ही मिल पा रहा है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट में इस वक्त बड़ी कंपनियों और SME के बीच भारी अंतर देखने को मिल रहा है। जहां मेनबोर्ड IPOs निवेशकों की पहली पसंद बने हुए हैं, वहीं SME सेक्टर अपनी वैल्यू बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में आए 151 SME IPOs में से करीब 46% अपने शुरुआती इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं।
इस निराशाजनक प्रदर्शन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि SME लिस्टिंग्स का मीडियन रिटर्न महज 1% है, जबकि मेनबोर्ड IPOs ने इस साल 27.1% का शानदार रिटर्न दिया है। यही नहीं, छोटी कंपनियों को ट्रैक करने वाला Nifty Emerge Index पिछले एक साल में 2.3% गिर चुका है, जबकि Nifty IPO Index में 10.4% की बढ़त देखी गई है।
क्यों बढ़ रही हैं चुनौतियां?
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, SME सेक्टर पर भारी दबाव की मुख्य वजह बढ़ती लागत है। IPO लाने का खर्च अब इश्यू साइज का 10% से 12% हो गया है, जो पहले 7% के आसपास रहता था। इस भारी-भरकम खर्च को निकालने के लिए कंपनियां IPO के दौरान बेहद आक्रामक वैल्युएशन मांग रही हैं, जिससे लिस्टिंग के बाद निवेशकों के लिए मुनाफा कमाने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
हालात इतने खराब हैं कि इस साल लिस्ट हुई 21 कंपनियों ने अपने डेब्यू प्राइस से 50% से ज्यादा की वैल्यू गंवा दी है।
क्या है भविष्य का हाल?
इतने खराब प्रदर्शन के बावजूद कंपनियों का IPO लाने का सिलसिला जारी है। सिर्फ सितंबर 2026 में ही 52 SME IPO की फाइलिंग्स हुई हैं। जानकारों का मानना है कि कंपनियां किसी फंडामेंटल सुधार के बजाय केवल सीजनल डेडलाइन को पूरा करने की जल्दबाजी में हैं। अब निवेशकों का भरोसा उन कंपनियों पर ज्यादा है जहां लिक्विडिटी बेहतर है और ग्रोथ के साफ संकेत दिख रहे हैं।
