NSE की लिस्टिंग ने भारतीय बाजार में हलचल बढ़ा दी है। जहाँ NSE **42.9** के P/E और **₹3,122 करोड़** के मुनाफे के साथ मार्केट लीडर है, वहीं BSE **54.28** के P/E पर कारोबार कर रहा है और डेरिवेटिव्स सेक्टर में अपनी पैठ बना रहा है।
वैल्यूएशन और प्रॉफिटेबिलिटी का गणित
दोनों एक्सचेंजों की तुलना करें तो वैल्यूएशन में बड़ा अंतर दिखता है। NSE का P/E मल्टीपल 42.9 है, जबकि BSE का 54.28 पर चल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही के नतीजों पर नजर डालें तो NSE ने ₹3,122 करोड़ का भारी-भरकम मुनाफा दर्ज किया, जबकि BSE का मुनाफा ₹873 करोड़ रहा। यह अंतर NSE की पहुंच और हाई-वॉल्यूम ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के रूप में उसके दबदबे को दिखाता है।
रेवेन्यू के मुख्य स्रोत
दोनों ही एक्सचेंजों की कमाई मुख्य रूप से ट्रांजैक्शन चार्जेस पर टिकी है। NSE के लिए इसके ऑपरेटिंग रेवेन्यू का करीब 79% हिस्सा इन्हीं चार्जेस से आता है, जिसमें अकेले ऑप्शंस ट्रेडिंग का योगदान 60% से ज्यादा है। कैश मार्केट में NSE की हिस्सेदारी लगभग 93% है। दूसरी तरफ, BSE लगातार डेरिवेटिव्स सेगमेंट में विस्तार कर रहा है। हालांकि NSE अभी लीडर है, लेकिन इक्विटी ऑप्शंस प्रीमियम में उसकी बाजार हिस्सेदारी फाइनेंशियल ईयर 2024 के 96% से घटकर 2026 तक करीब 75% रह गई है, जो प्रतिस्पर्धा के बढ़ते संकेत हैं।
रेगुलेटरी जोखिम और भविष्य की राह
इन दोनों कंपनियों के लिए सबसे बड़ा रिस्क SEBI के बदलते नियम हैं। रिटेल पार्टिसिपेशन और ऑप्शंस ट्रेडिंग में पोजिशन लिमिट को लेकर रेगुलेटरी बदलाव एक्सचेंजों के वॉल्यूम पर सीधा असर डाल सकते हैं। अब दोनों एक्सचेंजों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे टेक्नोलॉजी सर्विसेज, डेटा एनालिटिक्स और इंडेक्स प्रोडक्ट्स से अपनी कमाई को ट्रांजैक्शन फीस के अलावा कितना बढ़ा पाते हैं। निवेशकों के लिए यही 'की मॉनिटरेबल' (key monitorable) होगा।
