NSE Self-Listing Debate: शेयर बाजार के 'सेल्फ-लिस्टिंग' पर छिड़ी बहस, क्या बदलेंगे नियम?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
NSE Self-Listing Debate: शेयर बाजार के 'सेल्फ-लिस्टिंग' पर छिड़ी बहस, क्या बदलेंगे नियम?

NSE के चेयरमैन श्रीनिवास इनजेटी ने एक्सचेंज की 'सेल्फ-लिस्टिंग' को लेकर चर्चा छेड़ दी है। फिलहाल SEBI के नियमों के मुताबिक, एक्सचेंज को खुद को किसी और प्लेटफॉर्म पर लिस्ट कराना होता है ताकि हितों का टकराव (Conflict of Interest) न हो।

भारत के सबसे बड़े एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में आजकल 'सेल्फ-लिस्टिंग' को लेकर नई बहस छिड़ गई है। NSE चेयरमैन श्रीनिवास इनजेटी ने इस संभावना का संकेत दिया है कि भविष्य में एक्सचेंज खुद को अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्ट करने पर विचार कर सकते हैं। यह चर्चा मार्केट गवर्नेंस और रेगुलेटरी ढांचे को लेकर चिंताएं पैदा कर रही है, क्योंकि एक एक्सचेंज का दोहरा किरदार होता है—एक कमर्शियल कंपनी के रूप में और दूसरा, बाजार के रेगुलेटर के तौर पर।

गवर्नेंस की दीवार (Governance Firewall) क्यों है जरूरी?

वर्तमान में, SEBI के 2018 के नियमों के तहत किसी भी एक्सचेंज को खुद को अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्ट करने की अनुमति नहीं है। उन्हें एक प्रतिद्वंद्वी एक्सचेंज (जैसे BSE) पर लिस्ट होना पड़ता है। यह 'क्रॉस-लिस्टिंग' इसलिए अनिवार्य है ताकि एक्सचेंज का कामकाज पारदर्शी बना रहे और रेगुलेटरी अनुपालन की निगरानी कोई निष्पक्ष प्रतिस्पर्धी कर सके। निवेशकों के लिए, रेगुलेटर और कंपनी के बीच की यह स्पष्ट लक्ष्मण रेखा बाजार की तटस्थता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

निवेशकों के लिए जोखिम क्या है?

संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) के लिए 'गवर्नेंस' सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। अगर कोई एक्सचेंज खुद को ही रेगुलेट करने लगे, तो इससे मार्केट की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। इसे 'गवर्नेंस प्रीमियम' के नजरिए से देखा जाता है; यदि रेगुलेटरी ढांचे में कोई भी ढील आती है, तो इससे निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है और कैपिटल मार्केट की कॉस्ट बढ़ सकती है।

ग्लोबल मॉडल और भविष्य की राह

Nasdaq या HKEX जैसे वैश्विक एक्सचेंजों में भी सख्त बाहरी निगरानी की व्यवस्था है, ताकि किसी भी तरह के हितों के टकराव को रोका जा सके। फिलहाल, भारतीय बाजार के लिए SEBI का सख्त रुख ही एक ढाल की तरह काम कर रहा है। यदि भविष्य में नियमों में कोई बदलाव होता भी है, तो इसके लिए व्यापक कंसल्टेशन और कड़े गवर्नेंस मैंडेट की जरूरत होगी। निवेशकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या एक्सचेंज अपना ध्यान इंडिपेंडेंट ऑडिट और रेगुलेटरी जिम्मेदारियों को अलग रखने पर बनाए रखेगा या इसमें कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.