National Stock Exchange (NSE) ने भारत में पहली बार टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी किए हैं। REC Limited और Larsen & Toubro के साथ मिलकर **₹1,000 करोड़** जुटाए गए हैं, जिससे भविष्य में मार्केट सेटलमेंट की प्रक्रिया और भी तेज हो जाएगी।
बॉन्ड मार्केट में डिजिटल क्रांति
National Stock Exchange (NSE) ने डेट मार्केट के इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। Securities and Exchange Board of India (SEBI) के 'Regulatory Sandbox' के तहत चलाए गए इस पायलट प्रोग्राम में REC Limited और Larsen & Toubro ने Distributed Ledger Technology (DLT) का इस्तेमाल करके ₹500 करोड़ प्रति कंपनी जुटाए हैं।
कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम?
टोकनाइजेशन का मतलब है किसी सिक्योरिटी को डिजिटल लेजर पर एक डिजिटल रूप देना। पारंपरिक तरीके में बॉन्ड जारी करने में काफी समय लगता है और कागजी कार्रवाई ज्यादा होती है। नई DLT तकनीक के जरिए 'एटॉमिक सेटलमेंट' संभव होगा। इसका मतलब है कि बॉन्ड का मालिकाना हक और कैश का ट्रांसफर लगभग एक ही समय में पूरा हो जाएगा, जिससे सेटलमेंट में होने वाली देरी और रिस्क कम हो जाएगा।
क्या रहे पायलट के आंकड़े?
REC Limited ने 7 सितंबर को अपना इश्यू लॉन्च किया था, जिसमें ₹100 करोड़ का बेस साइज था और ₹400 करोड़ का ग्रीन शू ऑप्शन शामिल था। इस इश्यू को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला और यह बेस साइज से 7.9 गुना सब्सक्राइब हुआ, जिस पर कूपन रेट 7.30% रहा। इसके बाद 9 सितंबर को Larsen & Toubro ने अपना इश्यू जारी किया।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
बैंकों और म्यूचुअल फंड जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए यह बदलाव बॉन्ड लाइफसाइकिल को आसान बना देगा। डिजिटल होने से ओनरशिप ट्रैकिंग, इंटरेस्ट पेमेंट और मैच्योरिटी की तारीखों को मैनेज करना आसान हो जाएगा। हालांकि, अभी यह एक 'Regulatory Sandbox' में टेस्टिंग के तौर पर है, लेकिन अगर यह सफल रहा तो भविष्य में यह मार्केट का नया स्टैंडर्ड बन सकता है, जिससे कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च में भारी कमी आएगी।
