NSE में ऑप्शंस टर्नओवर दिसंबर 2025 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। SEBI और RBI की सख्ती के बाद आई इस गिरावट से एक्सचेंज की रेवेन्यू पर असर पड़ने की आशंका है, जो आगामी IPO के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर 25 अगस्त, 2026 की मंथली एक्सपायरी के दौरान ट्रेडिंग एक्टिविटी में भारी सुस्ती देखी गई। डेटा के अनुसार, ऑप्शंस प्रीमियम टर्नओवर घटकर करीब ₹67,000 करोड़ रह गया, जो दिसंबर 2025 के बाद सबसे कम वॉल्यूम है। यह गिरावट सिर्फ ऑप्शंस तक सीमित नहीं है, बल्कि कैश इक्विटी सेगमेंट में भी वॉल्यूम नवंबर 2025 के बाद के निचले स्तर पर आ गए हैं।
रेगुलेटरी सख्ती का असर
यह गिरावट SEBI और RBI द्वारा मार्केट में सट्टेबाजी कम करने के लिए उठाए गए कदमों का नतीजा है। रेगुलेटर्स ने डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ा दिए हैं और बैंक फंडिंग पर भी लगाम लगाई है। इसके अलावा, वीकली एक्सपायरी की फ्रीक्वेंसी में बदलाव और ट्रेडिंग आवर्स को 3:40 PM तक बढ़ाने जैसे फैसलों ने एक्सपायरी डे वाली पारंपरिक ट्रेडिंग स्ट्रेटेजी को बदल कर रख दिया है।
IPO की तैयारी और रेवेन्यू पर दबाव
NSE के आने वाले IPO के लिहाज से यह वॉल्यूम गिरावट चिंताजनक है। एक्सचेंज की कुल ऑपरेशनल रेवेन्यू का करीब 60% हिस्सा डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से आता है। वॉल्यूम कम होने का सीधा मतलब है ट्रांजैक्शन चार्जेस से होने वाली कमाई में कमी, जो एक्सचेंज की वैल्यूएशन के लिए एक बड़ा 'नेरेटिव चैलेंज' बन सकती है।
अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह गिरावट एक अस्थायी एडजस्टमेंट है या फिर बाजार लंबे समय के लिए कम लिक्विडिटी के दौर में प्रवेश कर चुका है।
