NSE के इंडेक्स ऑप्शंस मार्केट शेयर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। FY24 में जो शेयर **97%** था, वह अब घटकर **65%** रह गया है, जिसका मुख्य कारण हालिया रेगुलेटरी बदलाव हैं। चूंकि एक्सचेंज का लगभग **80%** रेवेन्यू ट्रांजैक्शन फीस से आता है, इसलिए यह गिरावट बिजनेस मॉडल में बदलाव की जरूरत को साफ दर्शाती है।
रेवेन्यू पर दबाव क्यों?
एक्सचेंज का मौजूदा बिजनेस मॉडल ट्रांजैक्शन चार्ज पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जो FY26 में कंपनी के ऑपरेटिंग रेवेन्यू का लगभग 79% था। यह हाई कंसंट्रेशन मार्केट एक्टिविटी और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में बदलाव के प्रति कंपनी को संवेदनशील बनाता है। जब पॉलिसी बदलावों के कारण ट्रेडिंग वॉल्यूम में कमी आती है, तो ट्रांजैक्शन से होने वाली कमाई पर सीधा दबाव पड़ता है।
डायवर्सिफिकेशन की ओर बढ़ते कदम
इस निर्भरता को कम करने के लिए NSE अब एक 'मल्टी-प्रोडक्ट फाइनेंशियल प्लेटफॉर्म' बनने की ओर काम कर रहा है। रणनीति के तहत, मार्केट डेटा, इंडेक्स लाइसेंसिंग, कनेक्टिविटी और लिस्टिंग सर्विसेज जैसे नॉन-ट्रांजैक्शनल रेवेन्यू सोर्सेज को बढ़ाया जा रहा है। अनुमान है कि ये सेगमेंट FY30 तक 13% की सालाना दर से बढ़ सकते हैं। साथ ही, बॉन्ड ट्रेडिंग और म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म जैसे नए क्षेत्रों में विस्तार कर एक्सचेंज अपनी कमाई को ट्रेडिंग चक्रों की अस्थिरता से दूर ले जाने की कोशिश कर रहा है।
कैश मार्केट अभी भी मजबूत
इंडेक्स ऑप्शंस में वर्चस्व घटने के बावजूद, NSE के पास अन्य सेगमेंट्स में एक मजबूत 'डिफेंसिव बफर' मौजूद है। कैश इक्विटी मार्केट में इसकी 93% से अधिक हिस्सेदारी है और यह अभी भी स्टॉक व इंडेक्स फ्यूचर्स के लिए प्रमुख प्लेटफॉर्म बना हुआ है। निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक्सचेंज कितनी तेजी से अपने नॉन-ट्रांजैक्शनल रेवेन्यू को बढ़ाता है और क्या यह डेरिवेटिव वॉल्यूम में आई गिरावट की भरपाई करने में सक्षम होगा या नहीं।
