नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सितंबर 2026 में अपने IPO के लिए कमर कस रहा है। इस IPO में 14.89 करोड़ शेयरों की ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल होगी। एक्सचेंज अपनी लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए एक अनोखी रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह अपने शेयरों को 'परमिटेड टू ट्रेड' कैटेगरी के तहत अपने ही प्लेटफॉर्म पर ट्रेड कराने की योजना बना रहा है। हालांकि, हितों के टकराव (conflict-of-interest) की चिंताओं के कारण SEBI इस प्रस्ताव की गंभीरता से समीक्षा कर रहा है।
NSE IPO: क्या होगी लिस्टिंग की रणनीति?
भारत के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की बहुप्रतीक्षित इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। उम्मीद है कि यह IPO सितंबर 2026 के अंत तक लॉन्च हो जाएगा। NSE को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) भी मिल चुका है। इस IPO में 14.89 करोड़ शेयरों की ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल होगी। बाजार के अनुमानों के मुताबिक, एक्सचेंज का वैल्यूएशन ₹5.2 लाख करोड़ से ₹5.3 लाख करोड़ के बीच हो सकता है।
दो प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग का अनोखा प्रस्ताव
अपनी लिस्टिंग की रणनीति के तहत, NSE एक ड्यूल-वेन्यू (dual-venue) स्ट्रक्चर का प्रस्ताव रख रहा है। इसके अनुसार, एक्सचेंज अपने प्रतिद्वंद्वी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर औपचारिक रूप से लिस्ट होगा, लेकिन साथ ही अपने शेयरों को NSE प्लेटफॉर्म पर 'परमिटेड टू ट्रेड' (permitted to trade) कैटेगरी के तहत ट्रेड करने की भी अनुमति चाहता है। इस स्टेटस से एक्सचेंज पर औपचारिक रूप से लिस्ट हुए बिना ही निवेशक NSE प्लेटफॉर्म पर शेयरों तक पहुंच पाएंगे।
नियामकीय पेंच और हितों का टकराव
इस प्रस्ताव के सामने सबसे बड़ी चुनौती मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस (market infrastructure institutions) से जुड़े नियामक ढांचे की है। चूंकि NSE एक सेल्फ-रेगुलेटरी ऑर्गेनाइजेशन (self-regulatory organization) के तौर पर काम करता है, इसलिए अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग और ट्रेडिंग की अनुमति से हितों का टकराव पैदा हो सकता है। भारत के नियम आम तौर पर स्टॉक एक्सचेंजों को सेल्फ-लिस्टिंग से रोकते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि एक्सचेंज निष्पक्ष रूप से अपना पर्यवेक्षण कर सके। NSE को इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए SEBI से विशेष मंजूरी लेनी होगी और इन गवर्नेंस चिंताओं को दूर करने के लिए एक नई स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था लागू करनी पड़ सकती है।
'परमिटेड टू ट्रेड' स्टेटस का फायदा
'परमिटेड टू ट्रेड' स्टेटस मांगने का मुख्य मकसद स्टॉक की लिक्विडिटी (liquidity) बढ़ाना और इसे निफ्टी (Nifty) जैसे बेंचमार्क इंडेक्स में शामिल होने के योग्य बनाना है। NSE ने 2019 में अपने इंडेक्स पात्रता नियमों में संशोधन किया था, जिससे इस कैटेगरी के सिक्योरिटीज को भी इंडेक्स में शामिल होने के लिए विचार किया जा सके, बशर्ते वे आवश्यक डिस्क्लोजर (disclosure) पूरा करें। वर्तमान में, लगभग 250 कंपनियां, जिनमें Elantas Beck India, Goodyear India और Novartis India जैसी एंटिटीज शामिल हैं, NSE पर इस स्टेटस के तहत ट्रेड करती हैं, भले ही वे औपचारिक रूप से लिस्टेड न हों।
अंतिम मंजूरी पर सबकी निगाहें
इस स्ट्रक्चर के लिए अंतिम मंजूरी NSE के लिए सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। हालांकि एक्सचेंज ने पहले नियामक के साथ लंबित मामलों को सफलतापूर्वक सुलझा लिया है, लेकिन यह सेल्फ-ट्रेडिंग का अनूठा अनुरोध सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की मांग करता है। निवेशक और बाजार सहभागियों की नजरें फाइनल प्रॉस्पेक्टस (prospectus) और SEBI के जवाब पर होंगी, क्योंकि यही तय करेगा कि एक्सचेंज इस ड्यूल-प्लेटफॉर्म रणनीति के साथ आगे बढ़ सकता है या उसे अपना ट्रेडिंग एक्टिविटी BSE तक सीमित रखना होगा।
