NSE का IPO अब हकीकत बनने वाला है। SEBI ने इस IPO के लिए 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) दे दिया है, जिससे एक्सचेंज को करीब एक दशक बाद पब्लिक होने का रास्ता साफ हो गया है। मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO आशीष चौहान ने कन्फर्म किया है कि भारतीय रेगुलेशन की वजह से कोई भी एक्सचेंज खुद के प्लेटफॉर्म पर लिस्ट नहीं हो सकता। इसका मतलब है कि NSE को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) या किसी दूसरे रेगुलेटेड एक्सचेंज पर लिस्टिंग करानी होगी। यह ग्लोबल प्रैक्टिस से अलग है, जहां NYSE जैसी बड़ी एक्सचेंज खुद पर ही लिस्टेड हैं। NSE अब IPO मैनेज करने के लिए इन्वेस्टमेंट बैंक्स की नियुक्ति करेगा और आने वाले महीनों में ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) फाइल करने की उम्मीद है।
IPO का खास स्ट्रक्चर: सिर्फ OFS
NSE के IPO की एक खास बात इसका स्ट्रक्चर है – यह पूरी तरह 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) होगा। इसका सीधा मतलब है कि NSE इस IPO के जरिए अपनी कंपनी के लिए कोई नया फंड नहीं जुटाएगा। बल्कि, कंपनी के मौजूदा शेयरहोल्डर्स, जिनकी तादाद करीब 1,95,000 है, अपने कुछ शेयर बेचेंगे। इस IPO से मिलने वाला पैसा सीधे इन बिकने वाले शेयरहोल्डर्स को जाएगा, न कि NSE कंपनी को। यह कदम शेयरहोल्डर्स को लिक्विडिटी (अपने शेयर आसानी से बेचने का मौका) देने के लिए उठाया गया है, न कि कंपनी के विस्तार या किसी नए प्रोजेक्ट के लिए फंड जुटाने के लिए। यह कई IPOs से अलग है, जहां कंपनियाँ फंड जुटाने के लिए पब्लिक में जाती हैं।
वैल्यूएशन पर क्या है अपडेट?
NSE की वैल्यूएशन को लेकर अभी से चल रही अटकलों पर CEO आशीष चौहान ने विराम लगाया है। उन्होंने कहा कि $50 बिलियन जैसी आकलित वैल्यूएशन सिर्फ अनुमान हैं और इन पर अभी भरोसा नहीं किया जा सकता। IPO की फाइनल प्राइसिंग तब तय होगी जब बाजार की मौजूदा स्थिति, कंपनी का प्रदर्शन और ग्लोबल इकोनॉमी जैसे फैक्टर्स को ध्यान में रखा जाएगा। मर्चेंट बैंकर इन सभी बातों पर विचार करके ही कीमत तय करेंगे।
गवर्नेंस में आएगा सुधार
लिक्विडिटी के अलावा, पब्लिक लिस्टिंग से कंपनी के गवर्नेंस (प्रशासन) में भी बड़ा सुधार होगा। आशीष चौहान का मानना है कि पब्लिक होने से निवेशकों और मीडिया की नजरें कंपनी पर रहेंगी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। यह किसी भी पब्लिक यूटिलिटी के लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने LIC के IPO का उदाहरण देते हुए कहा कि पब्लिक होने के बाद गवर्नेंस स्टैंडर्ड्स में सुधार देखा गया है, और यही उम्मीद NSE से भी है। इससे कंपनी के कामकाज में ज्यादा खुलापन आएगा।
संभावित जोखिम
हालांकि, इस IPO में कुछ जोखिम भी हैं जिन पर गौर करना जरूरी है। सिर्फ OFS स्ट्रक्चर का मतलब है कि NSE के पास अपने भविष्य के प्रोजेक्ट्स या विस्तार के लिए सीधे फंड नहीं होगा। इतने सारे शेयरहोल्डर्स, करीब 1,95,000, को मैनेज करना भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है। एक्सचेंज का खुद पर लिस्ट न हो पाना एग्जीक्यूशन को और जटिल बना सकता है। साथ ही, वैल्यूएशन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
