NSE IFSC और London Stock Exchange ने **13 अक्टूबर** को एक महत्वपूर्ण समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य GIFT City और लंदन के बीच क्रॉस-बॉर्डर ट्रेडिंग और डुअल लिस्टिंग की संभावनाओं को तलाशना है, हालांकि अभी किसी कमर्शियल प्रोडक्ट या समयसीमा का ऐलान नहीं किया गया है।
कनेक्टिविटी का नया रास्ता
इस साझेदारी का मुख्य फोकस कैपिटल मार्केट के बीच तालमेल बढ़ाना है। दोनों एक्सचेंज अब डुअल और क्रॉस-लिस्टिंग के विकल्पों पर काम करेंगे, जिसमें इक्विटीज, फिक्स्ड-इनकम सिक्योरिटीज और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETF) शामिल हैं। इस कदम का मकसद कंपनियों के लिए दोनों देशों से एक साथ फंड जुटाने की प्रक्रिया को आसान बनाना है।
इसके अलावा, NSE IFSC पर ऐसे डेरिवेटिव्स विकसित करने पर भी विचार किया जा रहा है जो FTSE Russell इंडेक्स का उपयोग बेंचमार्क के रूप में करेंगे। इससे विदेशी निवेशकों को GIFT City के इकोसिस्टम में काम करते समय एक परिचित ग्लोबल बेंचमार्क मिलेगा।
GIFT City के लिए रणनीतिक महत्व
यह समझौता भारत के GIFT City और लंदन के फाइनेंशियल हब के बीच एक पुल का काम करेगा। यह दोनों देशों के बीच चल रही 'Comprehensive Economic and Trade Agreement' की बातचीत के साथ भी तालमेल बिठाता है। GIFT City के लिए यह कदम वैश्विक लिक्विडिटी को आकर्षित करने और एक प्रमुख इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में अहम है।
स्कोप और रेगुलेटरी चुनौतियां
फिलहाल यह पूरी तरह से एक शुरुआती या एक्सप्लोरेटरी फेज है। अभी तक किसी भी कमर्शियल प्रोडक्ट के लॉन्च या इसके कार्यान्वयन की कोई निश्चित तारीख नहीं दी गई है। सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग देशों के फाइनेंशियल रेगुलेशंस की है।
भविष्य में किसी भी क्रॉस-बॉर्डर प्रोडक्ट को International Financial Services Centres Authority (IFSCA) और ब्रिटेन के Financial Conduct Authority (FCA) के जटिल मानकों को पूरा करना होगा। निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों एक्सचेंज इन रेगुलेटरी चुनौतियों से कैसे निपटते हैं और बाजार के लिए लिक्विड प्रोडक्ट कैसे तैयार करते हैं।
