National Stock Exchange (NSE) को SEBI से Corporate Bond Index Futures लॉन्च करने के लिए 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' मिल गया है। यह टूल निवेशकों को इंटरेस्ट रेट और क्रेडिट रिस्क को मैनेज करने में मदद करेगा, हालांकि इसके लिए Reserve Bank of India (RBI) की अंतिम मंजूरी अभी बाकी है।
बाजार में नया डेरिवेटिव प्रोडक्ट
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को विस्तार देते हुए एक अहम कदम उठाया है। SEBI से मिली इस मंजूरी के बाद, एक्सचेंज अब ऐसे डेरिवेटिव्स पेश कर सकेगा जो कॉर्पोरेट बॉन्ड्स के परफॉरमेंस को ट्रैक करेंगे। यह कदम एक्सचेंज की फिक्स्ड-इनकम सेगमेंट में पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।
क्यों है यह जरूरी?
फिलहाल, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स की ज्यादातर ट्रेडिंग 'ओवर-द-काउंटर' (OTC) यानी आमने-सामने के समझौतों के जरिए होती है। इनमें अपनी पोजीशन से बाहर निकलना या रिस्क को हेज (Hedge) करना काफी मुश्किल होता है। नए फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स से म्यूचुअल फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियों जैसे बड़े इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स को रिस्क मैनेजमेंट के लिए एक सेंट्रलाइज्ड प्लेटफॉर्म मिलेगा।
असली चुनौती: लिक्विडिटी और RBI की मंजूरी
हालांकि यह मंजूरी एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह प्रोडक्ट अभी लाइव नहीं है। एक्सचेंज को इसके लिए Reserve Bank of India (RBI) की फाइनल क्लीयरेंस चाहिए, क्योंकि केंद्रीय बैंक वित्तीय स्थिरता के मद्देनजर ऐसे डेट-बेस्ड डेरिवेटिव्स की बारीकी से जांच करता है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि इस प्रोडक्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसमें पार्टिसिपेशन कितना आता है। इतिहास गवाह है कि भारत में डेट-बेस्ड डेरिवेटिव्स वॉल्यूम की कमी के कारण अक्सर संघर्ष करते रहे हैं। यदि पर्याप्त बायर्स और सेलर्स नहीं मिले, तो लिक्विडिटी का संकट बना रह सकता है। अब निवेशकों की नजरें RBI की अगली मंजूरी और इस प्रोडक्ट के अंतिम डिजाइन पर टिकी हैं।
