एक नई स्टडी से खुलासा हुआ है कि NSE पर सिंगल-स्टॉक फ्यूचर्स का **59.4%** वॉल्यूम केवल चार दिनों की एक्सपायरी विंडो में ही सिमट जाता है, जो ट्रेडर्स के लिए लिक्विडिटी का बड़ा रिस्क खड़ा कर सकता है।
लिक्विडिटी का भ्रम
मार्केट एनालिटिक्स फर्म Vtrender की रिपोर्ट बताती है कि टॉप 100 सिंगल-स्टॉक फ्यूचर्स का 59.4% वॉल्यूम एक्सपायरी के दौरान देखा गया, जो अगस्त के 55% से कहीं ज्यादा है। इसका सीधा मतलब यह है कि मंथली वॉल्यूम का एक बड़ा हिस्सा असल ट्रेडिंग नहीं, बल्कि केवल रोलओवर (Rollover) एक्टिविटी से आ रहा है।
एवरेज बनाम मीडियन: असली सच
आंकड़े बताते हैं कि जहां इन 100 कॉन्ट्रैक्ट्स का कंबाइंड एवरेज डेली वॉल्यूम 11.40 लाख रहा, वहीं मीडियन वॉल्यूम केवल 6.59 लाख ही सिमट गया। यह भारी अंतर इस बात का संकेत है कि बाकी दिनों में मार्केट में काफी कम हलचल रहती है। जो ट्रेडर्स केवल एवरेज वॉल्यूम देखकर पोजीशन बनाते हैं, उन्हें नॉन-एक्सपायरी दिनों में ट्रेड एग्जीक्यूट करने में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।
स्टॉक्स में अंतर
हर कंपनी का हाल अलग है। PB Fintech जैसे स्टॉक्स का रोलओवर मल्टीपल 15.7 गुना तक है, यानी एक्सपायरी के वक्त यहां वॉल्यूम सामान्य दिनों के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। वहीं, Solar Industries (मल्टीपल: 1.9) और Paytm (मल्टीपल: 2.0) में वॉल्यूम का डिस्ट्रीब्यूशन ज्यादा कंसिस्टेंट है। यहां तक कि HDFC Bank, Reliance Industries और Infosys जैसे दिग्गज भी इस एक्सपायरी-स्केव से अछूते नहीं हैं।
मार्केट वोलाटिलिटी का हाल
अगस्त में नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) मैकेनिज्म को लेकर अनिश्चितता के कारण इंप्लाइड वोलाटिलिटी 90 के स्तर को पार कर गई थी, लेकिन सितंबर में इसमें कमी देखी गई है। जैसे-जैसे मार्केट 3% मूव कैप और सेटलमेंट के नए नियमों के साथ एडजस्ट हो रहा है, वोलाटिलिटी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। ट्रेडर्स के लिए सलाह यही है कि वे एक्सपायरी के अस्थायी उछाल और रेगुलर वॉल्यूम के बीच का फर्क समझना सीखें ताकि रिस्क को बेहतर ढंग से मैनेज किया जा सके।
