NSE Closing Session: MSCI रीबैलेंसिंग से मार्केट में हलचल, रिकॉर्ड **₹39,718 करोड़** का टर्नओवर

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
NSE Closing Session: MSCI रीबैलेंसिंग से मार्केट में हलचल, रिकॉर्ड **₹39,718 करोड़** का टर्नओवर

NSE के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में **31 अगस्त, 2026** को MSCI रीबैलेंसिंग के कारण रिकॉर्ड **₹39,718 करोड़** का टर्नओवर दर्ज किया गया। इस भारी वॉल्यूम के चलते कई बड़े स्टॉक्स में अचानक भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे सिस्टम की कार्यक्षमता पर सवाल उठ रहे हैं।

बाजार में मची हलचल

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) में सोमवार को अभूतपूर्व हलचल देखी गई। यह 20 मिनट का सेशन, जिसे ग्लोबल फंड्स के लिए एक फिक्स्ड प्राइस पर ट्रेड पूरा करने के मकसद से शुरू किया गया था, कुल कैश मार्केट वॉल्यूम (₹1.81 लाख करोड़) का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा अकेले समेट गया। सामान्य दिनों में यह आंकड़ा केवल 1 प्रतिशत के आसपास रहता है।

क्यों आई इतनी वोलेटिलिटी?

इस वॉल्यूम स्पाइक की असली वजह MSCI इंडेक्स रीबैलेंसिंग थी। जैसे ही ग्लोबल पैसिव फंड्स ने अपने पोर्टफोलियो में बदलाव किए, मार्केट में खरीदारी और बिकवाली का एक साथ दबाव बढ़ गया। डेटा के अनुसार, सेशन के दौरान 41 स्टॉक्स अपने 3 प्रतिशत के सर्किट लिमिट तक पहुंच गए, जिनमें 31 स्टॉक्स अपर सर्किट और 10 स्टॉक्स लोअर सर्किट पर लॉक हो गए।

Adani Group के शेयरों पर असर

इस भारी फ्लो का सबसे ज्यादा असर Adani Group की कंपनियों पर दिखा। Adani Energy Solutions में लगभग 10.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि यह हलचल कंपनी के फंडामेंटल्स की वजह से नहीं, बल्कि इंडेक्स ट्रैकिंग फंड्स के मैंडेटरी री-एलोकेशन के कारण थी। जब भी ग्लोबल इंडेक्स किसी स्टॉक को हटाते या जोड़ते हैं, तो फंड्स को शेयर की कीमत की परवाह किए बिना ट्रेड करना पड़ता है।

भविष्य की चुनौतियां

3 अगस्त, 2026 को शुरू हुए इस क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम पर अब सवाल उठने लगे हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाले रीबैलेंसिंग इवेंट्स को संभालने के लिए मौजूदा स्ट्रक्चर शायद पर्याप्त नहीं है। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या भविष्य में लिक्विडिटी मैनेजमेंट को बेहतर करने या टाइमिंग बढ़ाने की जरूरत है।

निवेशकों के लिए सलाह: इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दिनों में दिखने वाली वोलेटिलिटी तकनीकी (Technical) होती है, न कि फंडामेंटल। ऐसी घटनाओं के दौरान शॉर्ट-टर्म प्राइस मूवमेंट्स को कंपनी की लॉन्ग-टर्म वैल्यू से जोड़कर न देखें, ताकि आप बेवजह के डर से बच सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.