NSE के MD आशीष चौहान ने हालिया विदेशी निवेश (FPI) आउटफ्लो पर स्थिति साफ की है। उनके मुताबिक, भारतीय बाजारों से पैसा निकलना किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि ग्लोबल स्तर पर AI के दौर में पैसा शिफ्ट होने का एक अस्थायी बदलाव है।
बाजार से पैसा क्यों निकल रहा है?
NSE के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO आशीष चौहान ने FPIs द्वारा की जा रही बिकवाली को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने इसे भारतीय बाजार से मोहभंग नहीं, बल्कि एक 'साइक्लिक शिफ्ट' बताया है। मौजूदा समय में ग्लोबल इन्वेस्टर्स का पूरा फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों पर है, जिसके चलते अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में पूंजी का प्रवाह ज्यादा हो रहा है।
आंकड़ों में समझें बिकवाली का दबाव
सितंबर के महीने में भारतीय बाजारों ने जबरदस्त बिकवाली देखी है। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, 19 सितंबर तक FPIs ने बाजार से ₹23,676 करोड़ की निकासी की है। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि जुलाई और अगस्त के महीनों में FPIs ने ₹21,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश किया था।
निवेशकों के लिए अन्य चुनौतियां
सिर्फ AI रैली ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में चल रही अन्य हलचलें भी निवेश को प्रभावित कर रही हैं। पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी विदेशी निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसके अलावा, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) में बदलाव का असर भी ग्लोबल लिक्विडिटी पर पड़ता है, जिससे इमर्जिंग मार्केट की तुलना में अमेरिकी एसेट्स ज्यादा सुरक्षित नजर आने लगते हैं।
आगे क्या करना चाहिए?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए है। इतिहास गवाह है कि जब डेवलप्ड मार्केट्स में किसी सेक्टर की चमक कम होती है, तो ग्लोबल फंड्स दोबारा भारत जैसे मजबूत और ग्रोथ वाले बाजारों की ओर रुख करते हैं। फिलहाल निवेशकों को FPI डेटा और ग्लोबल इंटरेस्ट रेट के संकेतों पर नजर रखनी चाहिए, जो इस री-बैलेंसिंग के रुकने का संकेत दे सकते हैं।
