NSE के चेयरमैन श्रीनिवास इनजेटी ने उस नियम पर सवाल उठाए हैं जो स्टॉक एक्सचेंजों को खुद को अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्ट करने से रोकता है। यह बहस तब छिड़ी है जब NSE ने हाल ही में BSE पर लिस्टिंग की है, जिससे बाजार में रेगुलेटरी हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
रेगुलेटरी पाबंदी पर सवाल
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के चेयरमैन श्रीनिवास इनजेटी ने खुले तौर पर उस नियम को चुनौती दी है जो स्टॉक एक्सचेंजों को अपने ही ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर खुद को लिस्ट करने से रोकता है। यह मुद्दा तब और गंभीर हो गया है जब हाल ही में NSE ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर अपना डेब्यू किया और लगभग $47 बिलियन की वैल्यूएशन हासिल की।
हितों का टकराव (Conflict of Interest)
भारत में स्टॉक एक्सचेंज सिर्फ एक कमर्शियल कंपनी नहीं हैं, बल्कि वे 'फ्रंटलाइन रेगुलेटर' की भूमिका भी निभाते हैं। उनका काम मार्केट की निगरानी करना और कंपनियों के नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। आलोचकों का तर्क है कि अगर कोई एक्सचेंज खुद को अपने ही प्लेटफॉर्म पर लिस्ट करता है, तो वह अपने ही शेयरों की निगरानी खुद करेगा। इससे यह डर बना रहता है कि एक्सचेंज अपने रेगुलेटरी कर्तव्यों के बजाय मुनाफे और शेयर प्राइस को प्राथमिकता देने लगे।
SEBI का मौजूदा रुख
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अब तक यह अनिवार्य किया है कि एक्सचेंज केवल प्रतिद्वंद्वी प्लेटफॉर्म पर ही ट्रेड कर सकते हैं। यह 'क्रॉस-लिस्टिंग' मॉडल एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। अगर SEBI इस नियम को बदलने पर विचार करता है, तो उसे एक विशेष कमेटी बनानी होगी जो यह जांचेगी कि क्या आधुनिक गवर्नेंस प्रोटोकॉल इस हितों के टकराव को खत्म करने में सक्षम हैं।
निवेशकों के लिए क्या मायने हैं?
यह बहस सीधे तौर पर हमारे फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती से जुड़ी है। यदि भविष्य में नियमों में ढील दी जाती है, तो यह बाजार की प्रथाओं में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा। फिलहाल निवेशक और मार्केट एक्सपर्ट्स SEBI के किसी भी आधिकारिक सर्कुलर या कमेटी के गठन पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि किसी भी बड़े फैसले का असर न केवल एक्सचेंज के कामकाज पर, बल्कि मार्केट सेंटीमेंट पर भी पड़ सकता है।
