NSE के चेयरमैन श्रीनिवास इनजेटी ने भविष्य में स्टॉक एक्सचेंज के खुद के प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होने की संभावना जताई है। फिलहाल एक्सचेंज को हितों के टकराव से बचने के लिए क्रॉस-लिस्टिंग करनी पड़ती है, लेकिन यह बयान बड़े नीतिगत बदलाव की ओर इशारा करता है।
क्या है मौजूदा मॉडल?
वर्तमान में भारतीय शेयर बाजार में 'क्रॉस-लिस्टिंग' का नियम है। इसका मतलब है कि NSE के शेयर BSE पर लिस्ट हैं और BSE के शेयर NSE पर ट्रेड होते हैं। यह ढांचा इसलिए बनाया गया था ताकि एक्सचेंज खुद के शेयरों की निगरानी (Surveillance) करने के दौरान किसी भी तरह के हितों के टकराव (Conflict of Interest) से बच सकें।
क्यों है सेल्फ-लिस्टिंग पर बहस?
स्टॉक एक्सचेंज कंपनियों के लिए 'फ्रंटलाइन रेगुलेटर' की भूमिका निभाते हैं। यदि कोई एक्सचेंज खुद पर ही लिस्ट हो जाता है, तो वह एक साथ खिलाड़ी और रेफरी दोनों की भूमिका में आ जाएगा। जानकारों का कहना है कि इससे पारदर्शिता और निष्पक्ष निगरानी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
SEBI की क्या है भूमिका?
श्रीनिवास इनजेटी ने साफ किया है कि 2012 से 2015 के दौरान मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस के लिए नियम बदले गए थे, जिससे उन्हें पहली बार लिस्ट होने की अनुमति मिली थी। हालांकि, भविष्य में सेल्फ-लिस्टिंग को लेकर कोई भी फैसला पूरी तरह से SEBI के अधिकार क्षेत्र में है। रेगुलेटर बाजार की स्थिरता और निवेशकों के हितों को देखते हुए ही कोई भी नीतिगत बदलाव करेगा।
निवेशकों के लिए फिलहाल मौजूदा क्रॉस-लिस्टिंग का मॉडल ही मानक बना हुआ है। किसी भी बड़े बदलाव के लिए सरकार और SEBI को नए और सख्त फ्रेमवर्क तैयार करने होंगे ताकि निवेशकों का भरोसा और बाजार की निष्पक्षता बनी रहे।
