सितंबर महीने में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में कैश ट्रेडिंग का औसत दैनिक वॉल्यूम गिरकर **₹1.15 लाख करोड़** के 6 महीने के निचले स्तर पर आ गया है। विदेशी निवेशकों (FPIs) की तरफ से **₹35,861 करोड़** की भारी निकासी ने बाजार की रफ्तार को सुस्त कर दिया है।
सितंबर 2026 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार की सुस्ती साफ देखी गई। कैश सेगमेंट में औसत दैनिक टर्नओवर पिछले महीने के मुकाबले 4% घटकर ₹1.15 लाख करोड़ रह गया। यह पिछले 6 महीनों का सबसे कम स्तर है, जो निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।
FPIs की निकासी और बाजार पर असर
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का लगातार बाहर निकलना है। सिर्फ सितंबर महीने में ही FPIs ने ₹35,861 करोड़ के शेयर बेचे। साल 2026 में अब तक कुल आउटफ्लो लगभग $26.8 बिलियन तक पहुंच चुका है। इस भारी बिकवाली के कारण निफ्टी 50 और बीएसई सेंसेक्स दोनों में 6% की गिरावट दर्ज की गई।
वैश्विक तनाव और चुनौतियां
बाजार से पूंजी पलायन की मुख्य वजहें वैश्विक हैं। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़त ने सुरक्षित निवेश को ज्यादा आकर्षक बना दिया है, जिससे उभरते बाजारों (Emerging Markets) से पैसा बाहर निकल रहा है। साथ ही, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई और कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बना रही हैं।
नई पॉलिसी का असर
बाजार में हलचल के बीच 3 अगस्त 2026 को लागू हुए नए 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन' (CAS) ने भी ट्रेडिंग के आखिरी घंटों में अस्थिरता बढ़ा दी है। ट्रेडर अभी इस नई व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका असर वॉल्यूम पर दिख रहा है।
इसके अलावा, 24 सितंबर 2026 को लिस्ट हुआ NSE का अपना शेयर भी बाजार के मौजूदा ट्रेंड के साथ तालमेल बिठाते हुए उतार-चढ़ाव दिखा रहा है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बॉन्ड यील्ड स्थिर होते हैं और भारतीय कंपनियों के अर्निंग्स इन दबावों के बीच कैसी प्रदर्शन करती हैं।
