NSE के चीफ आशीष चौहान ने साफ कर दिया है कि लिस्टिंग के बाद भी एक्सचेंज के लिए कमर्शियल मुनाफे से ज्यादा जरूरी 'रेगुलेटरी स्टेबिलिटी' होगी। खासकर डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग में रिटेल निवेशकों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम आ सकते हैं, जिसका असर शॉर्ट-टर्म मुनाफे पर दिख सकता है।
मुनाफे के आगे सुरक्षा की प्राथमिकता
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के CEO आशीष चौहान ने फॉर्च्यून इंडिया बैंकिंग एंड NBFC समिट 2026 में एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि एक लिस्टेड कंपनी बनने के बावजूद, एक्सचेंज अपने मुख्य काम—बाजार की स्थिरता बनाए रखने—को मुनाफे से ऊपर रखेगा। यह उन 36 लाख शेयरधारकों के लिए एक अहम संदेश है जो कंपनी की लिस्टिंग के बाद तेजी से प्रॉफिट ग्रोथ की उम्मीद कर रहे थे।
डेरिवेटिव्स सेगमेंट पर असर
NSE का भारतीय बाजार में दबदबा है, जहां इक्विटी कैश ट्रेडिंग में 93% हिस्सेदारी और इक्विटी फ्यूचर्स में मोनोपॉली है। हालांकि, डेरिवेटिव्स सेगमेंट में रिटेल निवेशकों की भारी भागीदारी के चलते रिस्क बढ़ गया है। चौहान ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर भारत में भी ट्रेडर्स के लिए कड़े एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया लागू किए जा सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो ट्रेडिंग वॉल्यूम कम हो सकता है, जो सीधे तौर पर एक्सचेंज के ट्रांजैक्शन-बेस्ड रेवेन्यू को प्रभावित करेगा।
लंबी अवधि बनाम शॉर्ट-टर्म प्रॉफिट
मैनेजमेंट का रुख साफ है: वे तिमाही नतीजों के लिए बाजार की स्थिरता से समझौता नहीं करेंगे। साल 1994 में जब NSE शुरू हुआ था, तब मार्केट कैप ₹4 लाख करोड़ था, जो आज बढ़कर ₹475 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। इतनी बड़ी ग्रोथ के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। CEO ने कंपनियों को सलाह दी है कि वे सिर्फ स्टॉक प्राइस के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देने के बजाय फंडामेंटल बिजनेस हेल्थ पर फोकस करें।
अब निवेशकों की नजरें इस बात पर होनी चाहिए कि डेरिवेटिव्स को लेकर नए रेगुलेटरी नियम क्या होंगे, क्योंकि यही आने वाले समय में एक्सचेंज के बॉटम लाइन और लिक्विडिटी का सबसे बड़ा फैक्टर साबित होगा।
