NPCI ने ₹2,000 से ऊपर के UPI ट्रांजेक्शन पर प्रस्तावित **0.4%** मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को फिलहाल टाल दिया है। इस फैसले से फेस्टिव सीजन के दौरान डिजिटल पेमेंट पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
देश की पेमेंट रेगुलेटर संस्था NPCI ने ₹2,000 से ज्यादा के UPI ट्रांजेक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के विचार को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। फेस्टिव सीजन के दौरान कंज्यूमर स्पेंडिंग को बढ़ावा देने के लिए रेगुलेटर ने मौजूदा 'जीरो-फी' स्ट्रक्चर को ही जारी रखने का फैसला लिया है। यह निर्णय डिजिटल पेमेंट के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को फाइनेंशियली सस्टेनेबल बनाने और डिजिटल अडॉप्शन बढ़ाने के बीच के संतुलन को दर्शाता है।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) क्यों है जरूरी?
आसान भाषा में कहें तो MDR वह फीस है जो दुकानदार इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट प्रोसेस करने के लिए देता है। अब तक UPI सिस्टम 'जीरो-फी' मॉडल पर चला है, जिसने छोटे दुकानदारों को कैश छोड़कर डिजिटल पेमेंट की तरफ मोड़ा। आज भारत में 6.5 करोड़ से ज्यादा मर्चेंट्स इस नेटवर्क से जुड़े हैं। हालांकि, सिस्टम की सुरक्षा और नई इनोवेशन के लिए बढ़ते खर्च को देखते हुए, अब रेवेन्यू मॉडल पर चर्चा तेज हो गई है।
विकास और खर्च का गणित
भारत का लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ मर्चेंट्स को डिजिटल पेमेंट से जोड़ने का है। आज के दौर में साउंडबॉक्स जैसी टेक्नोलॉजी ने छोटे व्यापारियों का भरोसा तो जीता है, लेकिन ट्रांजेक्शन फीस का डर बिजनेस मार्जिन पर असर डाल सकता है। यदि फीस लगाई जाती है, तो खतरा यह है कि छोटे दुकानदार फिर से कैश की ओर न लौट जाएं। दूसरी ओर, बिना किसी फीस के, नेटवर्क की सुरक्षा और क्षमता बढ़ाने का पूरा खर्च पेमेंट प्रोवाइडर्स पर पड़ रहा है।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
निवेशकों को अब फेस्टिव सीजन के बाद RBI और NPCI की ओर से आने वाले निर्देशों पर नजर रखनी होगी। आने वाले समय में फीस का स्ट्रक्चर क्या होगा, यह पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स की प्रॉफिटेबिलिटी और साउंडबॉक्स जैसे हार्डवेयर की वायबिलिटी तय करेगा।
