NDA के दिग्गज नेता चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने Election Commission से पब्लिक स्पष्टीकरण की मांग की है। देश भर में वोटर लिस्ट रिवीजन के दौरान **13 करोड़** से ज्यादा नाम हटाए जाने के बाद उठ रहे सवालों के बीच यह कदम अहम है।
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और RLM नेता उपेंद्र कुशवाहा ने Election Commission of India को एक औपचारिक पत्र लिखकर आयोग के भीतर कथित आंतरिक मतभेदों पर जनता के सामने स्थिति साफ करने की मांग की है। यह मुद्दा जून 2025 में बिहार से शुरू हुई 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' प्रक्रिया से जुड़ा है, जो अब पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है।
क्या है विवाद की जड़?
रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले 10 महीनों के दौरान दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता रिकॉर्ड के प्रबंधन को लेकर 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। ये आपत्तियां ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने और उन्हें फिर से बहाल करने की तकनीकी प्रक्रियाओं से संबंधित थीं। आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे अभ्यास में ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से भी अधिक नाम हटाए गए हैं, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है।
आयोग का तर्क और चिंताएं
दूसरी ओर, Election Commission का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से रूटीन है और डेटाबेस की शुद्धता बनाए रखने के लिए जरूरी थी। आयोग के मुताबिक, इसका मकसद केवल मृत, दोहरे नाम वाले या स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से बाहर करना है। आयोग का दावा है कि सभी निर्णय आम सहमति से लिए गए हैं।
हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने से विपक्ष ने भी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। NDA सहयोगियों का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि अब राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर पूर्ण पारदर्शिता की मांग जोर पकड़ रही है। निवेशक और बाजार के जानकार भी ऐसी संस्थागत गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं, क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थिरता ही देश की पॉलिसी स्टेबिलिटी की नींव होती है।
