NASSCOM ने वित्त मंत्रालय से क्रॉस-बॉर्डर हेड ऑफिस और ब्रांच ऑफिस ट्रांजेक्शन के लिए GST नियमों को सरल बनाने की मांग की है। इंडस्ट्री चाहती है कि आंतरिक सेवा लेनदेन को 'जीरो-रेटेड' एक्सपोर्ट माना जाए, जिससे IT कंपनियों की वर्किंग कैपिटल में सुधार हो सके। इन बदलावों पर **8 अक्टूबर 2026** को होने वाली **57वीं GST काउंसिल** की बैठक में चर्चा संभव है।
टैक्स के बोझ से मुक्ति की कवायद
IT इंडस्ट्री की प्रमुख संस्था NASSCOM ने सरकार के सामने एक अहम प्रस्ताव रखा है। वर्तमान में, जब कोई भारतीय हेड ऑफिस अपनी विदेशी शाखा को सेवाएं देता है, तो इसे 'एक्सपोर्ट' के बजाय टैक्सेबल इवेंट माना जाता है। इससे कंपनियों पर दोहरा टैक्स बोझ पड़ता है और उनका काफी कैश वर्किंग कैपिटल के रूप में सिस्टम में फंस जाता है। NASSCOM का तर्क है कि इसे 'जीरो-रेटेड' एक्सपोर्ट मानने से कंपनियों का अनुपालन बोझ (compliance burden) कम होगा और ग्लोबल लेवल पर उनका कॉम्पिटिटिव एज बढ़ेगा।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
IT सेक्टर के शेयरहोल्डर्स के लिए यह खबर काफी महत्वपूर्ण है। कई भारतीय कंपनियां अपने Global Capability Centers (GCCs) के जरिए दुनिया भर में सेवाएं देती हैं। अगर सरकार 'निल' (Nil) वैल्युएशन के प्रस्ताव को मान लेती है, तो भविष्य में टैक्स विवादों की संभावना कम हो जाएगी और कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार दिखेगा।
क्या है उम्मीद?
हालांकि 8 अक्टूबर 2026 की आगामी GST काउंसिल मीटिंग में मुख्य फोकस संरचनात्मक सुधारों पर रहने की उम्मीद है, लेकिन इंडस्ट्री को इस प्रशासनिक स्पष्टीकरण की उम्मीद है। निवेशकों को सलाह है कि वे मीटिंग के बाद आने वाले आधिकारिक अपडेट पर नजर रखें, क्योंकि यह फैसला IT कंपनियों के कैश फ्लो के नजरिए से गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
