Motilal Oswal Nasdaq Q 50 ETF में हाल ही में जबरदस्त हलचल देखी गई। बाजार में शेयर की कीमत और फंड की असली वैल्यू (NAV) के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया है। ओवरसीज इन्वेस्टमेंट पर रेगुलेटरी लिमिट के चलते नए यूनिट्स का क्रिएशन रुक गया है, जिससे मार्केट में सप्लाई-डिमांड का संतुलन बिगड़ गया है।
बिगड़ा आर्बिट्राज का गणित
आमतौर पर एक ETF अपनी नेट एसेट वैल्यू (NAV) के करीब ट्रेड करता है, जिसे 'आर्बिट्राज' प्रोसेस बनाए रखती है। जब मार्केट प्राइस NAV से ऊपर जाता है, तो ऑथराइज्ड पार्टिसिपेंट्स नए यूनिट्स क्रिएट करके सप्लाई बढ़ाते हैं, जिससे भाव वापस NAV के पास आ जाता है। लेकिन इस बार विदेशी निवेश पर लगी $7 बिलियन की रेगुलेटरी लिमिट के कारण नए यूनिट्स नहीं बन पा रहे हैं। सप्लाई न बढ़ने से शेयर का भाव सिर्फ सट्टेबाजी (speculative trading) के दम पर भागने लगा, जिसका असली वैल्यू से कोई लेना-देना नहीं रहा।
SEBI के नियमों का असर
मामला तब और बिगड़ा जब 7 सितंबर से SEBI के नए नियम लागू हुए। पहले सर्किट ब्रेकर NAV के हिसाब से लगते थे, लेकिन अब यह पिछले दिन के क्लोजिंग प्राइस पर आधारित हैं। क्योंकि ETF का भाव पहले ही अपनी फेयर वैल्यू से काफी ऊपर जा चुका था, इसलिए 20% के ऊपरी सर्किट ने इसे और फुला दिया, जिससे यह फंड अपनी एक्चुअल वैल्यू से काफी दूर हो गया।
निवेशकों के लिए सबक
यह घटना इंटरनेशनल ETFs में छिपे जोखिमों को उजागर करती है। 21 सितंबर को इस ETF का वॉल्यूम सामान्य से 19 गुना बढ़कर 43 लाख यूनिट्स तक पहुंच गया। जब सट्टेबाजी का माहौल बदला, तो शेयर लगातार तीन दिनों तक 20% के लोअर सर्किट में फंस गया। निवेशकों को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि जब आर्बिट्राज का मैकेनिज्म रुकता है, तो बाजार भाव और फेयर वैल्यू में बड़ा अंतर आ सकता है, जो अचानक भारी गिरावट का कारण बन सकता है।
