Maharashtra Charity Commissioner ने RTI के जरिए साफ कर दिया है कि मई **2026** से Sir Ratan Tata Trust (SRTT) के कामकाज को रोकने वाला नियम उनके दफ्तर ने नहीं बनाया था। यह विवाद Tata Sons की गवर्नेंस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, जो अपनी **66%** हिस्सेदारी के लिए इन्हीं ट्रस्टों पर निर्भर है।
महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के ऑफिस ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट किया है कि वे उस विधायी संशोधन के पीछे नहीं हैं, जिसकी वजह से Sir Ratan Tata Trust (SRTT) का कामकाज ठप पड़ गया है। एक RTI (सूचना के अधिकार) के जवाब में रेगुलेटर ने पुष्टि की है कि ट्रस्टी के कार्यकाल और संख्या पर सख्ती बरतने वाला यह विवादित नियम उनके दफ्तर के बजाय राज्य के Law and Judiciary Department द्वारा लाया गया था।
गवर्नेंस का संकट और Tata Sons पर असर
यह स्पष्टीकरण उस रेगुलेटरी गतिरोध के बीच आया है जो 15 मई, 2026 को ऑर्डिनेंस लागू होने के बाद शुरू हुआ था। चूंकि SRTT और Sir Dorabji Tata Trust मिलकर Tata Sons की 66% हिस्सेदारी संभालते हैं, इसलिए ट्रस्ट-लेवल पर आई इस बाधा का सीधा असर पूरे ग्रुप पर दिख रहा है।
ट्रस्ट का काम न कर पाने की वजह से Tata Sons की शेयरहोल्डर मीटिंग्स और सालाना जनरल मीटिंग्स तक टालनी पड़ी हैं। इसके कारण न तो बड़े फैसले लिए जा पा रहे हैं और न ही नई लीडरशिप या कॉर्पोरेट नियुक्तियों पर कोई स्पष्टता आ रही है।
निवेशकों के लिए अहम जानकारी
फिलहाल, मामला तब और उलझ गया है जब ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने नोएल टाटा जैसे स्थायी ट्रस्टियों की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि राज्य सरकार या कोर्ट इस गवर्नेंस संकट का क्या हल निकालते हैं। जब तक रेगुलेटरी स्थिति साफ नहीं होती, Tata Sons के बोर्ड के कामकाज में बाधाएं बनी रह सकती हैं।
