लिक्विडिटी बढ़ाने की नई चाल
Metropolitan Stock Exchange (MSE) भारत के कैश इक्विटी मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है, जहाँ NSE और BSE का एकतरफा कब्ज़ा है। एक्सचेंज ने 8 जनवरी, 2026 से शुरू होकर जून 2026 तक चलने वाली लिक्विडिटी एन्हांसमेंट स्कीम (LES) लागू की है। इस स्कीम के तहत, मार्केट मेकर्स को लगातार दो-तरफा कोट्स (two-way quotes) देने का जिम्मा सौंपा गया है, ताकि मार्केट की गहराई बढ़ाई जा सके और बिड-आस्क स्प्रेड (bid-ask spread) को कम किया जा सके। स्कीम के तहत भाग लेने वाले मार्केट मेकर्स को हर महीने ₹40 लाख तक का इंसेंटिव मिलेगा और वे ट्रांजेक्शन चार्जेज़ से भी मुक्त रहेंगे। 8 जनवरी से 5 फरवरी, 2026 तक के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि ट्रेडेड वैल्यू में ₹49.47 लाख की बढ़ोतरी हुई है और ट्रेड होने वाले स्टॉक्स की संख्या बढ़कर 12 हो गई है, जो कि 27 जनवरी को सिर्फ Reliance के मुकाबले काफी बेहतर है। InCred Money की टीम के मुताबिक, यह स्ट्रैटेजिक कदम एक्सचेंज को पार्टिसिपेंट्स के लिए आकर्षक बनाने में अहम है।
सिस्टमैटिक चुनौती
इन तमाम कोशिशों के बावजूद, MSE के सामने NSE-BSE के मज़बूत दबदबे को तोड़ना एक पहाड़ जैसी चुनौती है। फिलहाल, NSE के पास भारत के कैश मार्केट वॉल्यूम का करीब 90-92% हिस्सा है, जबकि BSE के पास बाकी 8-10% है। MSE का ऑपरेशनल रिवाइवल 2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में ₹1,240 करोड़ की बड़ी फंडिंग पर टिका है। इस कैपिटल इंफ्यूजन से FY25 में इसका एसेट बेस बढ़कर ₹444 करोड़ हो गया, जो FY24 में ₹249 करोड़ था, और नेट लॉस कम होकर ₹34.2 करोड़ रह गया। हालांकि, 5 फरवरी, 2026 तक एक्सचेंज का अनलिस्टेड शेयर प्राइस सिर्फ ₹5.80 के आसपास रहा, जो निवेशकों की सावधानी को दर्शाता है। 5 फरवरी, 2026 तक, व्यापक भारतीय इक्विटी मार्केट में BSE Sensex 0.60% गिरकर 83,313.93 पर और Nifty 50 0.52% गिरकर 25,642.80 पर था, जो मार्केट के मौजूदा हेडविंड्स (headwinds) का संकेत देता है।
कॉम्पिटिशन का मैदान और आउटलुक
Groww और Zerodha जैसे बड़े ब्रोकर्स का स्ट्रैटेजिक सपोर्ट MSE की रणनीति का अहम हिस्सा है, और उम्मीद है कि ये फर्म्स अपने क्लाइंट्स को इस प्लेटफॉर्म पर ट्रेड करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। SEBI द्वारा प्रमुख एक्सचेंजों को प्रति माह केवल दो एक्सपायरी तक सीमित करने के हालिया रेगुलेटरी बदलाव से MSE को नए प्रोडक्ट्स के साथ इनोवेशन करने का मौका मिलेगा। कॉम्पिटिशन की दौड़ में, नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) को भी अपने इक्विटी और इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट लॉन्च करने की मंज़ूरी मिल गई है, जिसमें बड़े कैपिटल इन्वेस्टमेंट और फेज्ड रोलआउट की योजना है। एनालिस्ट्स की राय सतर्क है, वे चुनौतियों को स्वीकार करते हैं लेकिन MSE की लिक्विडिटी स्कीम की मार्केट में गहराई बढ़ाने की क्षमता को भी देख रहे हैं। वैश्विक स्तर पर, फरवरी 2026 की शुरुआत में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय इक्विटीज़ में अपनी बिकवाली जारी रखी, जिन्होंने जनवरी 2026 में भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर रुपए और हाई वैल्यूएशन्स के चलते $3.95 बिलियन का आउटफ्लो किया। इससे सभी भारतीय एक्सचेंजों के लिए इनफ्लो का माहौल और जटिल हो गया है। MSE की असली कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि वह मार्केट मेकर्स की प्रतिबद्धता को बनाए रख पाता है या नहीं और शुरुआती इंसेंटिव्स से आगे बढ़कर ऑर्गेनिक रूप से ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ा पाता है, जिससे वह अपने बड़े प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले एक खास जगह बना सके।
