एलिवेटर और एस्केलेटर बनाने वाली दिग्गज कंपनियों KONE और TK Elevator ने अपने भारतीय कारोबार को मर्ज करने के लिए Competition Commission of India (CCI) से औपचारिक मंजूरी मांगी है। यह कदम **€29.4 बिलियन** की बड़ी ग्लोबल डील का हिस्सा है, जिसके साल **2027** की दूसरी तिमाही से पहले पूरा होने की उम्मीद नहीं है।
बाजार में क्या बदलेगा?
CCI इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इस विलय से घरेलू बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा बढ़ जाएगा। भारत में KONE का मार्केट शेयर लगभग 25% है, जबकि TK Elevator (जिसे पहले Thyssenkrupp के नाम से जाना जाता था) की हिस्सेदारी करीब 7% है। मर्जर के बाद, नई कंपनी का एस्केलेटर और एलिवेटर इंस्टॉलेशन के साथ-साथ मेंटेनेंस सेगमेंट में भी बड़ा मार्केट शेयर हो जाएगा।
नियामक यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि इस डील के बाद प्रतिस्पर्धा कम न हो, जिससे ग्राहकों को ऊंची कीमतों या खराब सर्विस का सामना न करना पड़े। कंपनियों का तर्क है कि दोनों के बिजनेस मॉडल में सीधा टकराव नहीं है, इसलिए बाजार में एकाधिकार जैसी कोई स्थिति नहीं बनेगी।
ग्लोबल चुनौतियां और रिस्क
यह मर्जर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि ग्लोबल स्तर पर भी मुश्किलों में है। अमेरिका के Department of Justice ने भी इस सौदे को लेकर एंटी-ट्रस्ट जांच शुरू कर दी है। इसके अलावा, €29.4 बिलियन के इस बड़े सौदे में कर्ज का बोझ और ऑपरेशंस को एक साथ लाने (इंटीग्रेशन) की चुनौती भी निवेशकों की चिंता का कारण बनी हुई है।
फिलहाल, निवेशकों की नजरें CCI के फैसले पर टिकी हैं। अगर नियामक किसी तरह की शर्तों या बिजनेस यूनिट्स को बेचने (divestment) की मांग करता है, तो डील की टाइमलाइन और इसकी स्ट्रैटेजिक वैल्यू पर बड़ा असर पड़ सकता है।
