Specialised Investment Funds (SIFs) में निवेश तेजी से बढ़ रहा है। अगस्त 2026 तक इनका AUM बढ़कर **₹31,175 करोड़** हो गया है, जो जुलाई में **₹23,177 करोड़** था। कम से कम **₹10 लाख** निवेश करने वाले निवेशकों के लिए बने ये फंड्स बाजार में गिरावट के दौरान भी कमाई का मौका देते हैं।
भारत के इन्वेस्टमेंट लैंडस्केप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। SEBI द्वारा अप्रैल 2025 में पेश किए गए Specialised Investment Funds (SIFs) अब निवेशकों के बीच खासे लोकप्रिय हो रहे हैं। यह कैटेगरी म्यूचुअल फंड्स और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के बीच के अंतर को पाट रही है। अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, इस सेगमेंट का कुल AUM एक महीने के भीतर ही ₹23,177 करोड़ से उछलकर ₹31,175 करोड़ पर पहुँच गया है।
निवेशकों के लिए नया विकल्प
लंबे समय से भारतीय बाजार में रिटेल निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड्स और बड़े निवेशकों के लिए PMS ही मुख्य साधन थे। SIFs उन लोगों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरे हैं जो कम से कम ₹10 लाख का निवेश कर सकते हैं। हालाँकि, ये आम म्यूचुअल फंड्स से काफी अलग हैं और उन लोगों के लिए बेहतर हैं जो बाजार के जोखिमों को बेहतर तरीके से समझते हैं।
25% का खास नियम और शॉर्ट-सेलिंग
SIFs की सबसे बड़ी खासियत फंड मैनेजर को मिलने वाली टैक्टिकल आजादी है। जहाँ सामान्य म्यूचुअल फंड्स सिर्फ शेयरों के दाम बढ़ने पर दांव लगाते हैं, वहीं SIFs मैनेजर डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करके 'शॉर्ट पोजीशन' ले सकते हैं। आसान भाषा में कहें तो, बाजार गिरने पर भी ये फंड्स मुनाफा कमा सकते हैं या पोर्टफोलियो को सुरक्षित रख सकते हैं। SEBI के नियमों के अनुसार, मैनेजर अपने फंड का 25% तक हिस्सा इन डिफेंसिव रणनीतियों में लगा सकते हैं।
जोखिम को समझना जरूरी
बाजार में शॉर्ट-सेलिंग की सुविधा जितनी आकर्षक है, उतनी ही जोखिम भरी भी है। इसके लिए मैनेजर के पास काफी अनुभव होना जरूरी है। अगर बाजार उम्मीद के मुताबिक नहीं चलता, तो नुकसान भी सामान्य फंड्स की तुलना में तेजी से हो सकता है। इसके अलावा, ये एक्सचेंज पर ट्रेड नहीं होते, इसलिए लिक्विडिटी फंड के नियमों पर निर्भर करती है। चूँकि यह एक नई कैटेगरी है, इसलिए निवेशकों को किसी भी स्कीम को चुनने से पहले मैनेजर के परफॉर्मेंस ट्रैक रिकॉर्ड और लागत (Cost Structure) पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
