साल 2004 में लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स के बदले लाया गया STT (Securities Transaction Tax) अब सरकार के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन गया है। वित्त वर्ष 2027 में इससे **₹73,700 करोड़** जुटाने का लक्ष्य है, जबकि दूसरी ओर FY26 में रिटेल ट्रेडर्स को **₹91,685 करोड़** का भारी नुकसान हुआ है।
भारत के शेयर बाजार में STT को साल 2004 में एक 'टेंपरेरी ट्रेड-ऑफ' के रूप में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य लिस्टेड इक्विटी पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को हटाकर रेवेन्यू जुटाने का एक आसान तरीका बनाना था। लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद, हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। साल 2018 में लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को दोबारा लागू कर दिया गया, लेकिन STT न केवल बना रहा, बल्कि सरकार की कमाई का एक स्थायी और मजबूत स्तंभ बन गया है।
कमाई का नया जरिया
STT के असली मकसद और इसके मौजूदा इस्तेमाल के बीच अब एक बड़ा अंतर साफ दिख रहा है। सरकार अक्सर 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी हुई टैक्स बढ़ोतरी को 'सट्टेबाजी' (Speculation) पर लगाम लगाने वाला कदम बताती है, लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने ₹57,522 करोड़ का STT कलेक्शन किया था, जो अब 2026-27 में बढ़कर ₹73,700 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यह साफ दिखाता है कि बाजार में ट्रेडिंग वॉल्यूम जितना बढ़ेगा, सरकार का खजाना उतना ही भरेगा, चाहे मार्केट ऊपर जाए या नीचे।
रिटेल ट्रेडर पर मार
आम रिटेल निवेशक के लिए STT बाकी टैक्स से अलग है, क्योंकि यह मुनाफे पर नहीं बल्कि 'टोटल ट्रांजैक्शन वैल्यू' पर लगता है। FY26 के आंकड़ों के मुताबिक, इक्विटी डेरिवेटिव्स में 87.7% इंडिविजुअल ट्रेडर्स ने नुकसान उठाया है, जो कुल मिलाकर ₹91,685 करोड़ है। ऐसे में फ्यूचर्स पर 0.05% और ऑप्शंस प्रीमियम पर 0.15% का टैक्स ट्रेडर्स की पूंजी को तेजी से खत्म कर रहा है।
यह एक गंभीर नीतिगत विरोधाभास है। एक तरफ सिस्टम रिटेल ट्रेडर्स को डेरिवेटिव्स की लत से दूर रखने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ इसी ट्रेडिंग से सरकार को मोटा टैक्स मिल रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह टैक्स न तो सट्टेबाजी को रोक रहा है और न ही निवेशकों की रक्षा कर रहा है, बल्कि मार्केट में रिकवरी को और महंगा बना रहा है।
अब आगे क्या?
बाजार के जानकारों का मानना है कि निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह टैक्स स्ट्रक्चर मार्केट की लिक्विडिटी को प्रभावित कर रहा है। यदि लागत बढ़ने के कारण ट्रेडर्स डेरिवेटिव्स से दूर होते हैं, तो मार्केट में वॉल्यूम कम हो सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रेगुलेटर्स इस टैक्स स्ट्रक्चर पर पुनर्विचार करेंगे या सरकारी खजाने की जरूरतें मार्केट स्टेबिलिटी पर भारी पड़ती रहेंगी?
