SEBI के पूर्णकालिक सदस्य अमरजीत सिंह ने साफ किया है कि असली चुनौती जानकारी की उपलब्धता से कहीं ज़्यादा उसकी 'समझ' और 'विश्वसनीयता' है। इस समस्या को रिटेल निवेशकों की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी ने और बढ़ा दिया है। पिछले कुछ समय में रिटेल निवेशकों की मार्केट कैप में हिस्सेदारी करीब 19% तक पहुंच गई है, जो पिछले 22 सालों का रिकॉर्ड है।
इस बढ़ती भागीदारी के पीछे कई साइकोलॉजिकल फैक्टर काम कर रहे हैं। FOMO (Fear Of Missing Out) यानी कुछ छूट जाने का डर, और अति आत्मविश्वास जैसे व्यवहारिक पूर्वाग्रह रिटेल निवेशकों को, खासकर ऑप्शंस ट्रेडिंग जैसे सेगमेंट में, भारी नुकसान के बावजूद निवेश जारी रखने के लिए उकसा रहे हैं। भारत इस समय ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट वॉल्यूम के मामले में दुनिया में पहले नंबर पर है, और इसमें रिटेल निवेशकों की एक बड़ी हिस्सेदारी है।
पिछले एक दशक में, प्रमोटरों की हिस्सेदारी कम हुई है, वहीं रिटेल निवेशकों का दबदबा बढ़ा है। अनुमान है कि 2024 के अंत तक इक्विटी में रिटेल की हिस्सेदारी 23.4% तक पहुंच सकती है। वहीं, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) का रुख थोड़ा अलग रहा है, जिन्होंने 2025 में कुछ रकम निकाली, फिर 2026 की शुरुआत में वापसी की।
बाज़ार को इन जोखिमों से बचाने के लिए SEBI ने 'फिनफ्लुएंसर्स' पर नकेल कसनी शुरू कर दी है। ये वो लोग हैं जो वित्तीय सलाह के नाम पर या अनडिस्क्लोज्ड भुगतान के बदले उत्पादों का प्रचार करते हैं। SEBI के नए नियम रजिस्टर्ड एंटिटीज को अनरजिस्टर्ड इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम करने से रोकते हैं और लाइव ट्रेडिंग डेटा के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाते हैं। इसके लिए तीन महीने का लैग रखा गया है।
रिटेल निवेशकों द्वारा ऑप्शंस ट्रेडिंग में भारी वॉल्यूम बाज़ार में लिक्विडिटी तो बढ़ाता है, लेकिन साथ ही अस्थिरता को भी बढ़ावा देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि रिटेल सेंटिमेंट से प्रेरित यह सट्टा गतिविधि कीमतों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव ला सकती है, जिससे संस्थागत निवेशकों के लिए जोखिम प्रबंधन मुश्किल हो जाता है।
सीमित वित्तीय साक्षरता वाले रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी अपने आप में एक बड़ा जोखिम है। जल्दी पैसा कमाने की चाहत में ऑप्शंस ट्रेडिंग का सहारा लेना, फंडामेंटल एनालिसिस के बजाय व्यवहारिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित होना, और 'फिनफ्लुएंसर' कंटेंट से गुमराह होना, ये सब मिलकर गलत मूल्य निर्धारण (mispriced assets) को बढ़ावा दे रहे हैं। ये निवेशक झुंड मानसिकता (herd mentality) और बाजार में हेरफेर (market manipulation) के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
SEBI निवेशक शिक्षा और फिनफ्लुएंसर्स के खिलाफ अपनी कार्रवाईयों से बाज़ार तक पहुँच और निवेशक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। डीमैट अकाउंट और म्यूचुअल फंड SIPs में लगातार वृद्धि रिटेल निवेशकों की रुचि को दर्शाती है। हालांकि, बाज़ार का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि SEBI की शैक्षिक पहलें व्यवहारिक जोखिमों को कितनी प्रभावी ढंग से कम कर पाती हैं और रिटेल भागीदारी को सूचित निवेश में बदल पाती हैं, न कि केवल सट्टेबाजी में।