भारतीय शेयर बाज़ार में F&O स्टॉक्स के लिए नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू हो गया है, और इसके लागू होते ही ट्रेडिंग के आखिरी मिनटों में बड़ी प्राइस मूवमेंट देखने को मिल रही है। SEBI इसे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स की ओर एक कदम मान रहा है, लेकिन निवेशक इस नए सिस्टम से जूझ रहे हैं।
भारतीय बाज़ार में आया नया नियम
3 अगस्त, 2026 को भारतीय शेयर बाज़ारों में फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट के सभी स्टॉक्स के लिए नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू किया गया है। अब तक क्लोजिंग प्राइस की गणना पिछले 30 मिनट के एवरेज वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर होती थी, लेकिन अब यह तरीका बदल गया है। इसका मकसद भारतीय बाज़ार को NYSE जैसे ग्लोबल एक्सचेंजों के अनुरूप बनाना है, लेकिन शुरुआती हफ़्ते में ही इसने निवेशकों और ट्रेडर्स के बीच काफी कन्फ्यूजन और वोलैटिलिटी पैदा कर दी है।
नया सिस्टम कैसे काम करता है?
इस नए सिस्टम के तहत, ट्रेडिंग के आखिरी मिनटों का तरीका बदल गया है। दोपहर 3:15 बजे से 3:20 बजे तक ट्रांज़िशन पीरियड रहता है, जिसके बाद 3:30 बजे तक ऑर्डर डालने की विंडो खुलती है। फिर 3:28 और 3:30 बजे के बीच किसी भी समय रैंडम क्लोजर होता है, जिसके बाद 3:35 बजे तक प्राइस डिस्कवरी और मैचिंग का काम पूरा होता है। इसका उद्देश्य आखिरी सेकंड में होने वाली प्राइस मैनिपुलेशन को रोकना है, ताकि सारे आखिरी ऑर्डर्स को एक सिंगल ऑक्शन में शामिल किया जा सके, न कि लगातार चलने वाले एवरेज पर निर्भर रहा जाए।
चुनौतियाँ और बाज़ार में उथल-पुथल
सिस्टम के लॉन्च होने के पहले कुछ दिनों में ही अचानक प्राइस मूवमेंट के कारण यह काफी चर्चा में रहा। लॉन्च के दिन, Nifty 50 इंडेक्स में ऑक्शन पीरियड के दौरान लगभग 200 पॉइंट्स का उछाल देखा गया, जिसने कई मार्केट पार्टिसिपेंट्स को चौंका दिया। यह वोलैटिलिटी एक 'ब्लाइंड विंडो' के कारण भी बढ़ी है। जहाँ एक तरफ कैश मार्केट में ऑक्शन शुरू होते ही ट्रेडिंग रुक जाती है, वहीं डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स 3:40 बजे तक ट्रेड होते रहते हैं। इस गैप की वजह से ट्रेडर्स के लिए अपनी पोजीशन को हेज करना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि अंडरलाइंग कैश प्राइस तो स्थिर हो गया है, लेकिन उनके डेरिवेटिव पोजीशन अभी भी लाइव हैं।
रेगुलेटर का रुख और निवेशकों पर असर
SEBI जैसे मार्केट रेगुलेटर ने इन घटनाओं को एक बड़े सिस्टम ओवरहॉल के दौरान होने वाली शुरुआती दिक्कतें बताया है। रेगुलेटर का कहना है कि इस रिफॉर्म को वापस लेने का कोई इरादा नहीं है, क्योंकि यह बाज़ार की एफिशिएंसी और बेहतर प्राइस डिस्कवरी के लिए ज़रूरी है। वहीं, संस्थागत (Institutional) और खुदरा (Retail) निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता सेटलमेंट रिस्क की है। अगर ऑक्शन क्लोजिंग प्राइस और डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस में बड़ा अंतर आता है, तो ट्रेडर्स को अनपेक्षित वित्तीय नुकसान हो सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
चूंकि यह सिस्टम स्थायी है, अब बाज़ार का फोकस इस बात पर रहेगा कि लिक्विडिटी कितनी जल्दी सुधरती है और फाइनल ऑक्शन मिनट्स के दौरान ऑर्डर बुक कितनी स्थिर रहती है। आने वाले हफ़्तों में, निवेशकों को ऑक्शन पीरियड के दौरान Nifty और Sensex जैसे इंडेक्स के बीच प्राइस डाइवर्जेंस में कमी आनी चाहिए। जैसे-जैसे पार्टिसिपेंट्स नए क्लोजिंग प्राइस मेथड के हिसाब से अपनी स्ट्रैटेजी एडजस्ट करेंगे, शुरुआती वोलैटिलिटी कम होने की उम्मीद है, बशर्ते कि ऑक्शन में संस्थागत भागीदारी बढ़े ताकि एक गहरी और स्थिर ऑर्डर बुक बन सके।
